गणेश विसर्जन में बैरिकेड्स तोड़कर नदियों में मूर्तियां डुबोई, प्रदूषण की चिंता के बीच भी नहीं थमा सिलसिला
गणेश चतुर्थी उत्सव के समापन यानी गणेश विसर्जन के दौरान देशभर में एक बार फिर वही नजारा देखने को मिला, जो हर साल पर्यावरण को लेकर बहस छेड़ देता है। कई शहरों में भक्तों ने प्रशासन की तरफ से लगाई गई बैरिकेडिंग को धता बताते हुए प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी और जहरीले रंगों से रंगी मूर्तियों को सीधे नदियों में विसर्जित कर दिया भले ही बेंगलुरु जैसे शहरों में इन मूर्तियों पर पहले से पाबंदी लगी हो और लोगों के लिए अस्थायी तालाबों की व्यवस्था की गई हो।
दिलचस्प बात यह है कि यह सिलसिला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदायों में भी ऐसे ही नजारे देखने को मिले। सेंट लुईस और टेक्सास जैसे शहरों में भी भारतीय समुदाय के लोगों ने बड़ी और रंग-बिरंगी मूर्तियों को स्थानीय नदियों और जलाशयों में विसर्जित किया, जिससे वहां गंदगी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आईं।
विशेषज्ञों की चेतावनी पानी में घुल रहा है जहर
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पीओपी से बनी ये मूर्तियां आसानी से पानी में घुलती नहीं हैं, और इनमें इस्तेमाल किए गए रंगों में सीसा (लेड) और पारा (मर्करी) जैसी भारी धातुएं मौजूद होती हैं। ये जहरीले तत्व धीरे-धीरे पानी में घुलकर जलीय जीव-जंतुओं और मछलियों के लिए गंभीर खतरा बन जाते हैं, साथ ही नदियों और झीलों की पूरी इकोसिस्टम को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
प्रशासन की कोशिश परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन
इन खतरों को देखते हुए कई शहरों के प्रशासन ने लोगों से मिट्टी की बनी इको-फ्रेंडली मूर्तियां इस्तेमाल करने और घर पर ही बाल्टी या टब में विसर्जन करने की अपील की है। इसके साथ ही कई जगहों पर नदियों के बदले अस्थायी कृत्रिम तालाब भी बनाए गए हैं, ताकि लोगों की आस्था और परंपरा का सम्मान करते हुए नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सके।
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में भक्त अब भी पारंपरिक तरीके से नदियों में ही विसर्जन को प्राथमिकता देते हैं, जिससे प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद हर साल यह विवाद जस का तस बना रहता है आस्था बनाम पर्यावरण की यह बहस अब भी अनसुलझी है।
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