पराली जलाने से हवा जहरीली, मिट्टी भी बंजर
नई दिल्ली। उत्तर भारत में खरीफ सीजन की धान कटाई के साथ ही पराली जलाने का सिलसिला एक बार फिर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बन गया है। सरकार और एनजीटी के कड़े प्रतिबंधों और दंडात्मक प्रावधानों के बावजूद पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में पराली जलाई जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह धुआं जहां दिल्ली-एनसीआर में शीतकालीन प्रदूषण में 40 फीसदी तक की हिस्सेदारी निभाता है, वहीं खेतों की प्राकृतिक उर्वरता और मिट्टी के मित्र सूक्ष्मजीवों को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
मिट्टी के पोषक तत्वों की भारी बर्बादी, सूक्ष्मजीवों पर संकट
वैज्ञानिकों के आंकड़ों के अनुसार, पराली जलाना सीधे तौर पर खेतों की मिट्टी को बंजर करने जैसा है:
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एक टन पराली जलने पर नुकसान: वैज्ञानिकों के मुताबिक, 1 टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर जलकर नष्ट हो जाता है।
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लाभकारी सूक्ष्मजीव खत्म: आग के तापमान से मिट्टी में मौजूद जरूरी और लाभकारी बैक्टीरिया व कवक मर जाते हैं, जिससे खेत की प्राकृतिक उर्वरता घटती है।
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स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार: पराली के महीन कण (पार्टिकुलेट मैटर) हवा के साथ दूर तक फैलते हैं, जिससे दमा, सांस की बीमारियां, आंखों में जलन और दिल से जुड़ी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं।
जलाने के बजाय विकल्प अपनाएं किसान, खाद और चारे के रूप में उपयोगी
विशेषज्ञों के अनुसार, पराली जलाने के बजाय इसके कई सुरक्षित और लाभदायक विकल्प उपलब्ध हैं:
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जैविक खाद बनाएं: पराली में 0.5 से 1% नाइट्रोजन, 0.6% फॉस्फोरस और 1.5% पोटाश के साथ जिंक, आयरन और मैगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं। इसे बायो-डीकंपोजर, ट्राइकोडर्मा या कम्पोस्टिंग के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदला जा सकता है।
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आधुनिक कृषि यंत्र: रोटावेटर, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रॉ रीपर और डिस्क हैरो की मदद से पराली को खेत की मिट्टी में मिलाकर जैविक खाद बनाया जा सकता है।
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पशु चारे में उपयोग: धान की पराली में पर्याप्त फाइबर और प्रोटीन होता है, जो पशुओं के आहार और स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है।
आईएआरआई के उपग्रह आंकड़ों में 287 घटनाएं दर्ज
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सैटेलाइट मॉनिटरिंग: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के कंसोर्टियम 'सीआरईएएमएस' के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच उपग्रह निगरानी में सात राज्यों के 287 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
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