पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं 'ग्रीन पटाखे'
नई दिल्ली। सरकारी संस्थान राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज 'ग्रीन पटाखे' पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है। ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन जलाने पर 40 से 50 फ़ीसदी तक कम हानिकारक गैस पैदा करते हैं।
विशेषज्ञ के अनुसार इनसे हानिकारक गैसें कम निकलती हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनसे प्रदूषण बिल्कुल नहीं होगा।सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है।
ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे। इस फॉर्मूले के जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैसों में घुल जाएगा। नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं।
पानी पैदा करने वाले पटाखे
ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे. नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र का नाम दिया है. पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है.
सल्फ़र और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखे
नीरी ने इन पटाखों को स्टार क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ़ थर्माइट क्रैकर। इनमें ऑक्सिडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होती है। इसके लिए ख़ास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है.
कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल
इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे नीरी ने एसएएफएएल- सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी सफल नाम दिया है।
अरोमा क्रैकर्स
इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारण गैस कम पैदा होगी, बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।
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