कुत्तों के मुंह से निवाला छीनकर खाना पड़ा था
अहमदाबाद (गुजरात)। मरे हुए मवेशियों पर कंकाल जैसे बीस लोग टूट पड़े थे। उनके दांत चाकू की तरह दिख रहे थे। भूख ने उनके पेट में जैसे आग लगा रखी थी। गाँव की ढलान वाली पगडंडी के दूसरे छोर से एक चीख़ सुनाई दी, 'दौड़ो, मवेशियों पर हमला हो गया है, दौड़ो। उक्त दृश्य देखकर ग्रामीण कालू के शरीर में सिहरन दौड़ गई और ऊपर चढ़कर उसने जो नज़ारा देखा, उसे कालू सात जन्मों में भी नहीं भूल सकता था। कालू सिहर उठा। एक पल के लिए उसे लगा, कहीं ये गिद्ध तो नहीं? वे गिद्धों की तरह ही टूट पड़े थे। दो-तीन लोग मवेशी के हर पैर को पकड़े हुए थे, जबकि ऊपर चढ़े दो आदमी तलवारों से उन्हें काट रहे थे। अगर उनके शरीर पर लंगोटी के अलावा कोई कपड़ा होता, तो वे उसे भी फाड़ देते।
कालू बड़ी मुश्किल से उठा, उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। वह रोते-रोते सो गया था। आँखें खुलीं तो उनमें फिर आँसू भर आए. वह उठकर बोला, "हे भगवान, तुम्हारा नामोनिशान मिट जाए। मेरे लोगों की यह कैसी दशा हो गई है। वह भारी साँसें लेते हुए बड़बड़ाया, मानो कोई पहाड़ तोड़ रहा हो, 'दुनिया में बुराई से भी बदतर कोई चीज है तो वह है भूख!
गुजराती उपन्यास 'मानवीनी भवाई' में छप्पनिया अकाल की पृष्ठभूमि में भूख और इंसानी बेबसी की इस भयावह तस्वीर को बयां किया गया है। कालू नाम के काल्पनिक किरदार के ज़रिए लेखक ने प्राकृतिक आपदा, भूख, इंसानी संघर्ष और आत्मसम्मान के लिए किए गए भीषण संघर्ष को दर्शाया है।
1899-1900 के इस भयानक अकाल में चारे के अभाव में मवेशी और भेड़-बकरियां मर गईं। इंसानों की हालत भी ऐसी हो गई थी कि वे कंकाल जैसे दिखने लगे थे। प्रकृति की बेरहमी के सामने इंसान कितना बेबस हो जाता है। भूख की वजह से रिश्ते और इंसानियत तक दम तोड़ने लगते हैं। लोग अनाज के एक-एक दाने के लिए तरसते हैं। ऐसे लोगों को 'भूखे भूत' कहा जाता है।
छप्पनिया अकाल?
1899 में देश के कई हिस्सों में मानसून नाकाम हो गया। इसके चलते 1900 में ऐसा अकाल पड़ा, जिसकी मिसाल पिछले 200 साल में नहीं मिलती। तब अनाज और पशुओं के चारे की भारी कमी हो गई थी। छोटे किसान, कारीगर और भूमिहीन मजदूर सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। अनाज न मिलने के कारण गरीब लोग पेड़ों की पत्तियां और 'थोर' (एक प्रकार का कैक्टस) के तने खाकर गुजारा करने को मजबूर थे।
'गांधीजी ने भी राहत कार्य के लिए मदद जुटाई'
दक्षिण अफ़्रीका में रहने वाले गुजरातियों ने भी मदद के लिए पैसा जुटाया। इनमें गांधीजी भी शामिल थे, लेकिन आपदा का दायरा इतना बड़ा था कि यह मदद नाकाफ़ी साबित हुई।
किन लोगों ने इस मुद्दे के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई?
अच्युत याग्निक के मुताबिक़, भारत के पितामह कहे जाने वाले दादाभाई नौरोजी ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठाई.
उन्हें महसूस होने लगा था कि ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ अब एक अलग तरह की रणनीति की ज़रूरत है. उन्होंने राजनीतिक राष्ट्रवाद की आवश्यकता पर जोर दिया.
इसका असर तब देखने को मिला, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 18वां अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ. इस अधिवेशन में अंबालाल सांकरलाल को स्वागत समिति का अध्यक्ष चुना गया.
अच्युत याग्निक ने अंबालाल सांकरलाल के भाषण का हवाला देते हुए लिखा है, "गुजरात एक औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र है. पिछले दो अकालों के कारण एक करोड़ से कम आबादी वाले गुजरात में 25 लाख लोग मर चुके हैं. इसकी वजह देश से बाहर ले जाई जा रही संपत्ति है."
"अहमदाबाद में कई उद्योगपति थे. उन्हें लगता था कि बिगड़ते राजनीतिक हालात की वजह से उनके कारोबार पर असर पड़ रहा है. इसलिए वे राजनीतिक आंदोलन शुरू करना जरूरी समझने लगे थे."
"इनमें से कई लोगों की अपनी कपड़ा मिलें थीं. ब्रिटिश सरकार उनसे 'अनुचित तरीके से एक्साइज़ ड्यूटी वसूल रही थी'. वहीं, लगान व्यवस्था की वजह से किसान भी परेशान थे."
"इन सभी मुद्दों के बीच कांग्रेस के इस अधिवेशन में एक सवाल उठा- 'हम इतने गरीब क्यों हैं?'"
ब्रिटिश शासन का विरोध करने के बावजूद ये लोग पूरी तरह से ब्रिटिश शासन को ख़त्म करने के पक्ष में नहीं थे. अहमदाबाद कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया:
"हम भारत में ब्रिटिश शासन के स्थायी बने रहने की प्रार्थना करते हैं. हम उस प्राचीन और सम्मानित व्यवस्था की बहाली की मांग करते हैं, जिसने भारत को कानून-व्यवस्था और स्थायी शांति दी है. हम न्याय, स्वतंत्रता, समान अधिकारों और साम्राज्य में अपनी भागीदारी की मांग करते हैं."
करीब 20 लाख लोगों की मौत हुई
ब्रिटिश सरकार के राजपूताना प्रांत में राहत कार्यों के लिए बनाई गई समिति के अध्यक्ष जेई स्कॉट ने अपनी किताब 'इन फ़ेमाइन लैंड' में लिखा है कि ब्रिटिश वायसराय ने हालात की समीक्षा के लिए कलकत्ता में एक बैठक की थी। उस समय ब्रिटिश सरकार का अनुमान था कि ब्रिटिश शासन वाले इलाकों में कुल 2 करोड़, 20 लाख और दूसरी रियासतों में 2 करोड़, 70 लाख लोग अकाल से प्रभावित थे। कुल 4 करोड़, 90 लाख लोग अकाल की चपेट में थे। वायसराय ने बताया था कि 30 लाख लोगों को राहत दी जा रही थी। सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में बॉम्बे प्रांत, काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना शामिल थे। करीब 60 लाख लोग सरकारी राहत पर निर्भर थे।
साल 1901 की सरकारी अकाल रिपोर्ट के मुताबिक़, ब्रिटिश इलाकों में करीब 10 लाख लोगों की मौत हुई थी, जिनमें से पांचवां हिस्सा हैजे की वजह से मरा था। रियासतों के इलाकों में भी करीब 10 लाख लोगों की मौत हुई थी। सरकारी आंकड़ों में इस अकाल के दौरान अकेले मुंबई प्रांत में 7,40,376 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। इस प्रांत में गुजरात का इलाका भी शामिल था।
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