'ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और संविधान की रक्षा के लिए आये हैं'
नयी दिल्ली। सुबह दस बजे मिंटो ब्रिज के पास यातायात सामान्य चल रहा था। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के कार्यकर्ता जुटना शुरू हो गये थे। उस वक़्त ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि दोपहर होते-होते ये संख्या इतनी बढ़ जाएगी।
हालांकि, एक बात स्पष्ट थी, पिछले प्रदर्शनों की तुलना में इस बार समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता अधिक संख्या में दिख रहे थे। ये सिर्फ़ दिल्ली के पास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िलों से ही नहीं, बल्कि पूर्वी यूपी के दूर-दूर के ज़िलों से आए थे।कांग्रेस के नेतृत्व में हुई विपक्ष की इस महारैली में देश के कोने-कोने से कांग्रेस के कार्यकर्ता भी पहुंचे।
गुजरात से आए कांग्रेस कार्यकर्ता शहज़ाद ख़ान ने कहा, सिर्फ़ कांग्रेस कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग भी बड़ी संख्या में इस महारैली में शामिल हुए हैं।
भीड़ के बीच रामलीला मैदान पहुंचना मुश्किल हुआ
दोपहर क़रीब एक-डेढ़ बजे राहुल गांधी खुली बस में सवार हो मिंटो ब्रिज के नीचे से गुज़रे। अखिलेश यादव भी उनके साथ इसी बस में थे। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बस के क़रीब पहुंच अपने नेताओं को चेहरा दिखाने की जद्दोजहद कर रहे थे। कई के हाथों में पोस्टर थे जिन पर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का चेहरा था।कार्यकर्ता ज्ञानेश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करते हुए नारेबाज़ी कर रहे थे।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित इस रैली में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचे थे। रामलीला मैदान के आसपास की सड़कों पर भीड़ थी। मैदान के भीतर जाने के रास्तों पर भी लोगों की आवाजाही लगातार बनी हुई थी। भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि हमें मैदान के भीतर पहुंचने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और इंडिया गठबंधन के दूसरे सहयोगी दलों के कार्यकर्ता शामिल थे।
लेकिन, यहां मौजूद लोगों की चिंता सिर्फ़ राजनीतिक दलों के समर्थन तक सीमित नहीं थी। कई लोग चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और अपने वोट के अधिकार को लेकर सवाल उठा रहे थे। रैली में शामिल एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ी नहीं हैं, लेकिन उनके लिए यह मुद्दा बेहद गंभीर है। अगर वोट चोरी हुई है तो इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता।
बिहार से आए एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि वह यहां ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग और संविधान की रक्षा के लिए पहुंचे हैं। रैली में मौजूद अधिकतर लोग एक ही सुर में बात कर रहे थे। हर किसी की जुबान पर कथित वोट चोरी का मुद्दा था।
इंडिया गठबंधन को भीड़ से क्या हासिल हुआ?
इस जुटान के साथ कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर अपना विरोध दर्ज कराया, लेकिन रैली से पार्टी को मिले राजनीतिक बल और उसके आगे के चुनावी असर को लेकर दो वरिष्ठ पत्रकारों की राय अलग है। उन्होंने कहा कि सड़कें और मैदान भरे दिखाई दिए और विपक्ष सरकार के ख़िलाफ़ संदेश देने में सफल रहा।
कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ स्टूडेंट्स और सामाजिक संगठनों से भी रैली में शामिल होने की अपील की थी। विपक्ष ने सरकार को यह संदेश दिया है कि वह अपनी शिकायतों को लेकर सार्वजनिक विरोध जारी रखेगा। जो विपक्ष सदन के भीतर अपनी मांग आगे नहीं बढ़ा पा रहा था, उसने इस आयोजन के ज़रिए उसे लोगों के बीच रखा।
भीड़ के बाद दलों का तालमेल कैसे आगे बढ़ता है
विपक्ष की रैलियों में पहले भी भीड़ आती रही है। असली परीक्षा यह है कि उस भीड़ के बाद दलों का तालमेल कैसे आगे बढ़ता है और कांग्रेस अपनी स्थिति कितनी मज़बूत कर पाती है? रैली में मिला समर्थन क्या राजनीतिक विकल्प बन सकेगा?सत्ता से नाराज़ होना और किसी दूसरी पार्टी को उसका विकल्प स्वीकार करना अलग बातें हैं। मतदाता यह भी देखता है कि जिस काम को लेकर उसे शिकायत है, क्या दूसरा दल वह काम कर सकता है। नाराज़ मतदाता के सामने यह सवाल रहता है कि वह जिस सरकार से असंतुष्ट है, उसकी जगह किस पर भरोसा करे? रैली उस नाराज़गी को आवाज़ दे सकती है, लेकिन विकल्प का भरोसा भी बनाना उतना ही अहम है। सरकार के ख़िलाफ़ गुस्सा कांग्रेस के लिए तभी उपयोगी होगा, जब लोग उसे विकल्प के तौर पर देखने लगें। इसके लिए कांग्रेस को अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक ताक़त बढ़ानी होगी। केवल रैली होने या नेताओं के साथ आ जाने से यह काम पूरा नहीं होता।
राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का विकल्प देने में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-अलग दलों को साथ लेकर पांच साल की स्थिर सरकार देने के लिए बीजेपी या कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल की छतरी ज़रूरी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की मज़बूत स्थिति के बिना बीजेपी के सामने राष्ट्रीय चुनौती खड़ी करना मुश्किल होगा।
कांग्रेस सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय गठबंधन को दिशा देने की ताक़त हासिल करे। कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और राज्यों में उसकी अपनी स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी हैं। कांग्रेस के सामने सवाल दोहरा है, उसे सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष को आवाज़ देनी है और साथ ही यह भरोसा भी बनाना है कि वह सरकार का विकल्प बन सकती है।
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