काबुल में नाकाम पाकिस्तान: हवाई हमलों और सैन्य ताकत का सहारा

Sep 30, 2026 - 18:58
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काबुल में नाकाम पाकिस्तान: हवाई हमलों और सैन्य ताकत का सहारा
Pakistan Airstrikes Kabul

काबुल/इस्लामाबाद। काबुल में अपनी मनमर्जी चलाने में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान ने अब अफगानिस्तान में सीधे तौर पर सैन्य ताकत दिखानी शुरू कर दी है। इस्लामाबाद न तो वहां की सरकार पर अपना प्रभाव जमा पा रहा है और न ही उसके पास कोई दूसरा ठोस विकल्प बचा है, जिसकी वजह से वह लगातार हवाई हमलों का सहारा ले रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि रणनीतिक गहराई का सिद्धांत किस हद तक ध्वस्त हो गया है, और पाकिस्तान अब उसी तालिबान की जीत को अस्थिर करने के तरीके खोज रहा है, जिसका उसने कभी जश्न मनाया था।

यूएनएएमए की रिपोर्ट: कुनार हमलों में आम नागरिकों की मौत की पुष्टि

'पारहेशिया न्यूज' में एक रिपोर्ट में बताया गया, "यूएनएएमए ने एक बार फिर अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद नागरिकों की मौत की पुष्टि की है। कुनार में सितंबर के हमलों में एक पुरुष, एक महिला और एक बच्ची मारे गए। इस्लामाबाद ने घोषणा की थी कि उसने आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया है और टीटीपी लड़ाकों को मारा है। उन लड़ाकों की पहचान स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं की गई है, जबकि नागरिकों की पहचान, हमेशा की तरह, अब नाम, परिवार और मरने की जगह के साथ हुई है। यह पाकिस्तान के अफगान युद्ध में बार-बार होने वाला असंतुलन बनता जा रहा है: सेना अपने लक्ष्यों की घोषणा करती है, जबकि दूसरे उसके द्वारा मारे गए लोगों का दस्तावेजीकरण करते हैं।"

सैन्य दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास

इसके अनुसार, सितंबर के हमले कोई अलग-थलग घटना नहीं थे। पाकिस्तानी अभियानों में बार-बार अफगान नागरिकों की मौत हुई है, चाहे वह सीमावर्ती प्रांत हों या काबुल में ओमेद नशा पुनर्वास केंद्र। पाकिस्तान भले ही यह दावा करे कि उसके हमले आतंकियों पर थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस्लामाबाद हमलों के बाद अपने टारगेट को लेकर अलग ही कहानी पेश करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह तो हो सकता है कि किसी हमले में आम नागरिक और आतंकी दोनों मारे जाएं, लेकिन जब बार-बार आम अफगानों की मौत की पुष्टि हो रही है, तो सिर्फ इरादे को सबूत नहीं माना जा सकता। बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमले में मारा कौन गया? सेना अपने ऑपरेशन को सही ठहराती है, लेकिन उसके दावों के पक्ष में सबूत ढूंढना मुश्किल है, जबकि आम नागरिकों के मारे जाने के सबूत साफ तौर पर मौजूद हैं, जिनके नाम और परिवार तक सामने हैं।

घरेलू विफलता और सेना की राजनीतिक पकड़ पर सवाल

पाकिस्तानी सेना हमेशा से यह कहकर राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखती है कि देश की सुरक्षा सिर्फ वही सुनिश्चित कर सकती है। लेकिन खैबर पख्तूनख्वा में लगातार जारी हिंसा और उग्रवाद ने सेना के इसी दावे की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ एक सैन्य विफलता नहीं है, बल्कि इससे कहीं बड़ा मामला है। लगातार हो रहे हमले यह साबित करते हैं कि सुरक्षा के नाम पर सत्ता पर काबिज रहने का सेना का तर्क अब कमजोर पड़ रहा है और उसकी राजनीतिक हैसियत पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।

दोहरे मोर्चे पर जंग: नाकामियों को छिपाने की रणनीति

रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि कैसे पाकिस्तान के जनरल अफगानिस्तान में युद्ध लड़ रहे हैं क्योंकि वे काबुल पर अपनी मर्जी थोपने में विफल रहे हैं। वे घर पर भी एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि वे यह स्वीकार नहीं कर सकते कि उन्होंने टीटीपी पर कितना कम नियंत्रण हासिल किया है। हवाई हमले उन्हें एक साथ दोनों लड़ाइयां लड़ने की अनुमति देते हैं। वे एक ऐसी अफगान सरकार को दंडित कर सकते हैं जो उनकी बात मानने से इनकार करती है और उस सजा को पाकिस्तानियों के सामने सबूत के रूप में पेश कर सकते हैं। वे अपनी विफलता के सबूतों को गायब करते हैं।"

इनपुट : आईएएनएस

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