जेपीएससी-जेएसएससी घोटाला: सॉफ्टवेयर में हेरफेर से लेकर स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालकर लिखवाने का हुआ खुलासा

Aug 31, 2026 - 11:45
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जेपीएससी-जेएसएससी घोटाला: सॉफ्टवेयर में हेरफेर से लेकर स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालकर लिखवाने का हुआ खुलासा

रांची। झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली के लिए सॉफ्टवेयर के जरिए डेटा में हेरफेर से लेकर अति सुरक्षित स्ट्रांग रूम से उत्तरपुस्तिकाएं बाहर निकालकर लिखवाने तक का खेल हुआ है। सीआईडी की जांच के दौरान गिरफ्तार परीक्षा संचालन एजेंसी के कर्मियों, निदेशकों और बिचौलियों के बयानों से यह बड़ा खुलासा हुआ है।  

जांच में होटलों और किराए के फ्लैटों में विशेषज्ञों को बुलाकर कॉपियां लिखवाने और उन्हें वापस गुप्त तरीके से स्ट्रांग रूम में रखने के तथ्य भी सामने आए हैं। फिलहाल सीआईडी तकनीकी साक्ष्यों, सर्वर लॉग्स और वित्तीय लेन-देन के आधार पर इस पूरे सिंडिकेट की जांच आगे बढ़ा रही है।

सीआईडी की विशेष जांच टीम द्वारा आरोपियों से की गई पूछताछ में यह बात सामने आई है कि परीक्षा कराने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसियों ने सुनियोजित तरीके से सॉफ्टवेयर और पोर्टल विकसित कर परीक्षा परिणामों में हेरफेर किया।

वेंडर एजेंसी 'मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड' के कर्मी हेमंत वर्मा ने खुलासा किया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में आरओ और एआरओ परीक्षा की तर्ज पर ही झारखंड में भी यह खेल हुआ। वर्ष 2025 में टीडीपीएल के निदेशकों ने पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर जेपीएससी परीक्षाओं के लिए एक खास सॉफ्टवेयर और पोर्टल तैयार कराया था।

आरोपियों ने सीआईडी को बताया है कि इस सॉफ्टवेयर की मदद से परीक्षा से पहले ही सेटिंग वाले उम्मीदवारों को चिन्हित कर लिया जाता था और उनके उत्तरों को सीधे डेटाबेस के जरिए बदल दिया जाता था। मुख्य परीक्षा की कॉपियों में हुई हेरफेर के खेल का खुलासा एक अन्य अभियुक्त हेमंत वर्मा के बयान से हुआ है।

बयान के अनुसार, परीक्षा समाप्त होने के बाद जब उत्तरपुस्तिकाओं को जेपीएससी कार्यालय के स्ट्रांग रूम में जमा करा दिया जाता था, तब वहां से सेटिंग वाले अभ्यर्थियों की खाली कॉपियां बाहर निकाली जाती थीं। इसके बाद वेंडर एजेंसी टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, सत्यपाल सिंह, प्रदीप कुमार सिंह और मोहम्मद उस्मानी इन कॉपियों को विभिन्न होटलों और किराए के फ्लैटों तक पहुंचाते थे। होटलों और फ्लैटों में विशेषज्ञों तथा संबंधित परीक्षार्थियों की मौजूदगी में उत्तर भरवाए जाते थे।

इसके बाद इन कॉपियों को दोबारा बेहद गुप्त तरीके से वापस स्ट्रांग रूम में पहुंचा दिया जाता था। मामले के मुख्य अभियुक्तों में से एक अभय तिवारी ने भी सीआईडी के समक्ष स्वीकार किया है कि सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्र अधिकारी की प्रारंभिक परीक्षा समाप्त होने के बाद मुख्य परीक्षा की तैयारी के नाम पर रांची के हरिओम टावर में एक कमरा किराए पर लिया गया था। गिरोह के एजेंट सतपाल और मिश्रा पंजाब, हरियाणा और लखनऊ से विशेषज्ञों को बुलाते थे।

इन विशेषज्ञों से अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं लिखवाई जाती थीं। यही नहीं, उत्तर लिखे जाने के बाद कॉपियों के अंक बढ़वाने के लिए विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों से संपर्क किया जाता था। आरोपी अभय तिवारी के कबूलनामे के मुताबिक, उसने अपने अभ्यर्थियों के अंक बढ़वाने और कॉपियां लिखवाने के एवज में 40 लाख रुपये दिए थे।

इनपुट : आईएएनएस

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