अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस: जहां शब्द नहीं, इशारे बोलते हैं दिल की बात
नई दिल्ली। जब जुबां खामोश होती है, तो बातें खत्म नहीं होतीं बस उनका लहजा बदल जाता है। कभी आंखों से, कभी मुस्कुराहट से, तो कभी हाथों के इशारों से बात पूरी हो जाती है। यही सांकेतिक भाषा की ताकत है, जहां शोर नहीं होता, मगर एहसास सीधा दिल तक पहुंच जाता है। बधिर लोग भी हम-आप की तरह ही हंसते हैं, रोते हैं, नाराज होते हैं और दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि उनकी दुनिया में आवाज की जगह इशारे बोलते हैं।
कब और क्यों मनाया जाता है यह दिन
- हर साल 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है
- यह दिन 2017 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव से प्रेरित है
- इस साल यह दिवस 'बधिर लोगों के मानवाधिकारों की घोषणा' थीम के तहत मनाया जा रहा है
- पहली बार यह दिन 2018 में अंतरराष्ट्रीय बधिर सप्ताह के हिस्से के तौर पर मनाया गया था
- भारत में इसे "सांकेतिक भाषा दिवस" कहा जाता है और 2018 से हर साल इसे मनाया जा रहा है
- 23 सितंबर की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1951 में विश्व बधिर संघ (WFD) की स्थापना हुई थी
संयुक्त राष्ट्र का मानना सांकेतिक भाषा बहुत जरूरी
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस प्रस्ताव में यह स्वीकार किया गया कि सांकेतिक भाषा और उससे जुड़ी सेवाओं तक शुरुआती पहुंच, बधिर व्यक्तियों के विकास और वैश्विक विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बेहद जरूरी है। साथ ही इसे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का अहम हिस्सा भी माना गया है।
दुनियाभर में कितने बधिर लोग, कितनी भाषाएं
- विश्व बधिर संघ के मुताबिक दुनियाभर में 7 करोड़ से ज्यादा बधिर लोग हैं
- इनमें से 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग विकासशील देशों में रहते हैं
- दुनियाभर में कुल मिलाकर 300 से ज्यादा अलग-अलग सांकेतिक भाषाएं इस्तेमाल की जाती हैं
- संयुक्त राष्ट्र सांकेतिक भाषाओं को पूर्ण विकसित प्राकृतिक भाषा मानता है, जो बोली जाने वाली भाषाओं से संरचनात्मक रूप से बिल्कुल अलग होती हैं
- अंतरराष्ट्रीय बैठकों और यात्राओं के दौरान एक "इंटरनेशनल साइन लैंग्वेज" भी इस्तेमाल की जाती है, जो अपेक्षाकृत सरल और सीमित शब्दावली वाली होती है
भारत की अपनी सांकेतिक भाषा ISL
भारत में इस दिन भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) को खास तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है। यह एक स्वतंत्र दृश्य-हाथ भाषा है, जो बधिर और श्रवण दोनों समुदायों के बीच संवाद को आसान बनाती है। खास बात यह है कि ISL हिंदी, अंग्रेजी या भारत में बोली जाने वाली किसी भी अन्य भाषा से बिल्कुल अलग है इसकी अपनी संरचना है, और यह किसी बोली जाने वाली भाषा का हाथों से किया गया अनुवाद मात्र नहीं है।
सरकार का संदेश "सबको साथ लेकर चलना अधिकार है"
इस मौके पर विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग ने समावेशिता, सुलभता और मानवाधिकारों में सांकेतिक भाषा की भूमिका पर जोर दिया। मंत्रालय ने कहा, "बातचीत या संवाद सिर्फ अपनी बात कहने का जरिया नहीं है, बल्कि यह जानकारी, शिक्षा और न्याय पाने का एक अहम हिस्सा है। अब वक्त आ गया है कि दुनिया को ऐसी जगह बनाया जाए जहां सभी तरह के संकेतों का ध्यान रखा जाए और सबको साथ लेकर चलना एक अधिकार बने।"
वहीं मध्य प्रदेश के सामाजिक न्याय एवं निःशक्तजन कल्याण विभाग ने भी इस दिन श्रवण बाधित लोगों के अधिकार, सम्मान और समान अवसरों को लेकर जागरूकता बढ़ाने का संकल्प लिया। विभाग ने कहा कि अगर कौशल को सही अवसर मिले, तो आत्मनिर्भरता की राह अपने आप आसान हो जाती है और इसी सोच के साथ राज्य सरकार दिव्यांगजनों को कौशल विकास प्रशिक्षण से जोड़कर उन्हें नई पहचान और आत्मनिर्भर भविष्य की दिशा दे रही है।
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