मानवाधिकार संस्था ने पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और 'ऑनर किलिंग' की कड़ी निंदा की
प्रमुख मानवाधिकार संस्थाओं ने पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ रही हिंसा, यौन उत्पीड़न और तथाकथित 'ऑनर किलिंग' (सम्मान के नाम पर हत्या) की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इनकी कड़ी निंदा की है। संस्था ने समाज में पीड़ितों को ही दोषी ठहराने (विक्टिम ब्लेमिंग) की मानसिकता और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की नाकामी को आड़े हाथों लिया है। जानिए पाकिस्तान में मानवाधिकार संकट और ऑनर किलिंग के मामलों पर पूरी विस्तृत रिपोर्ट।
इस्लामाबाद: पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती बर्बरता, घरेलू हिंसा और तथाकथित 'ऑनर किलिंग' (इज्जत के नाम पर हत्या) के मामलों को लेकर मानवाधिकार संस्थाओं ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। मानवाधिकार आयोग और नागरिक अधिकार संगठनों ने देश भर में महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अत्याचारों की तीखी निंदा करते हुए इसे कानून और मानवीय गरिमा का गंभीर संकट करार दिया है।
संगठन ने विशेष रूप से समाज में व्याप्त उस पितृसत्तात्मक मानसिकता पर प्रहार किया, जहां उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता है (Victim Blaming), जबकि गंभीर अपराधों के दोषी कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं।
चिंताजनक आंकड़े और लगातार सामने आ रहे मामले
मानवाधिकार संगठनों द्वारा संकलित हालिया रिपोर्टों से एक भयावह तस्वीर उभर कर सामने आई है:
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सैकड़ों महिलाओं की हत्या: संस्थाओं के अनुसार, हर साल पाकिस्तान में सैकड़ों महिलाओं को अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी करने, प्रेम संबंध रखने या बुनियादी अधिकारों की मांग करने पर उनके ही परिजनों (पिता, भाई या पति) द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है।
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कुप्रथाओं का साया: सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में 'कारी' (Karo-Kari) जैसी मध्यकालीन कुप्रथाओं के नाम पर महिलाओं को सामाजिक रूप से कलंकित कर उनकी हत्या को जायज ठहराने की कोशिश की जाती है।
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आंकड़ों में उछाल: जेंडर-बेस्ड वायलेंस (GBV) के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है, जिनमें हत्या, अपहरण, शारीरिक यातना और यौन उत्पीड़न के मामले शामिल हैं।
'कानून केवल कागजों पर': लचर न्याय प्रणाली पर सवाल
मानवाधिकार संस्थाओं ने रेखांकित किया है कि पाकिस्तान में कानून होने के बावजूद जमीनी स्तर पर अपराधियों को सजा नहीं मिल पा रही है:
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दोषसिद्धि की नगण्य दर: 'एंटी-ऑनर किलिंग' कानून लागू होने के बावजूद मामलों में सजा की दर (Conviction Rate) निराशाजनक रूप से कम बनी हुई है।
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समझौते और कानूनी खामियां: स्थानीय स्तर पर कबीलाई पंचायतों (जिरगा) का दबाव और परिवारों के बीच आपसी सुलह-समझौते के चलते अधिकांश हत्यारे बिना किसी कड़ी सजा के बरी हो जाते हैं।
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पुलिस और प्रशासन की उदासीनता: संस्था ने आरोप लगाया कि कई मामलों में स्थानीय पुलिस प्राथमिक जांच दर्ज करने में देरी करती है या फिर परिवार के प्रभाव में आकर साक्ष्यों को कमजोर कर देती है।
संस्था की प्रमुख मांगें
मानवाधिकार आयोग ने पाकिस्तान की संघीय और प्रांतीय सरकारों से तत्काल कड़े कदम उठाने की अपील की है:
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ऑनर किलिंग और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन किया जाए।
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जिरगा या कबीलाई पंचायतों द्वारा दिए जाने वाले गैर-कानूनी फैसलों पर सख्त प्रतिबंध लगे और ऐसे फैसलों में शामिल लोगों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों।
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घरेलू हिंसा और धमकियों का सामना कर रही महिलाओं के लिए सुरक्षित शेल्टर होम, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श की पुख्ता व्यवस्था की जाए।
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पुलिस और न्यायिक तंत्र को लैंगिक संवेदनशीलता का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।
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