'प्रकृति का अंधाधुंध दोहन विनाशकारी, पर्यावरण बचाना इंसानों की जिम्मेदारी'; अमेरिका में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम में वैश्विक पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन पर गंभीर विचार व्यक्त किए हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि प्रकृति पर आधिपत्य जमाने और उसका अंधाधुंध दोहन करने की पश्चिमी उपभोगवादी मानसिकता ने पूरी पृथ्वी को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है।जानिए डॉ. मोहन भागवत के अमेरिका संबोधन के प्रमुख अंश, भारतीय पर्यावरण दर्शन और सतत विकास के उनके संदेश से जुड़ी पूरी विस्तृत रिपोर्ट।

Aug 30, 2026 - 10:50
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'प्रकृति का अंधाधुंध दोहन विनाशकारी, पर्यावरण बचाना इंसानों की जिम्मेदारी'; अमेरिका में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

न्यूयॉर्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि पर्यावरण और दुनिया को बचाए रखना इंसानों की जिम्मेदारी है। उन्होंने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित सार्वभौमिक एकता समारोह में विकास के ऐसे मॉडल की वकालत की है, जो प्रकृति को नष्ट किए बिना लोगों को समृद्ध होने की अनुमति दे।

समारोह को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्यों के तौर पर पेश किया जाता है। उन्होंने कहा, "दुनिया कई समस्याओं का सामना कर रही है। विकास से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। पर्यावरण बचाने का मतलब विकास रोकना माना जाता है। तो इसका क्या रास्ता है?"

मोहन भागवत ने आगे कहा, "हमें रास्ता दिखाना होगा और हमारे पूर्वजों ने अपने त्याग व संयम के जरिए यह रास्ता दिखाया है।" भागवत ने कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच मानव जीवन के केंद्र में उत्तरदायित्व को रखती है। लोगों को यह विचार करना चाहिए कि उनके कार्यों से सिर्फ केवल उनका अपना जीवन बल्कि समाज और प्रकृति का भी कल्याण होता है या नहीं।

उन्होंने कहा, "हम प्रकृति से जुड़े हैं। हमें यह देखना होगा कि हम जो भी करें, उससे न सिर्फ हमारा, बल्कि हर चीज का भला हो।" उन्होंने तर्क दिया कि इंसानी समझ का इस्तेमाल प्राकृतिक दुनिया पर हावी होने या उसे खत्म करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि, इससे लोगों पर जीवन के दूसरे रूपों की रक्षा करने की बड़ी जिम्मेदारी आती है।

भागवत ने कहा, "मनुष्य दुनिया के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें सोचने-समझने की खास काबिलियत मिली है। उन्हें सही और गलत की समझ भी दी गई है।"

खाद्य श्रृंखला में मनुष्यों के बढ़ते महत्व का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि उनकी प्रगति की कीमत पर्यावरण को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी है। उन्होंने कहा, "इस खाद्य श्रृंखला में मनुष्य का आगमन बहुत देर से हुआ और वह सबसे निचले पायदान पर था, लेकिन 3,000 वर्षों के भीतर वह मध्य में आ गया और 7,000 वर्षों में वह शीर्ष पर पहुंच गया और 8,000 पौधों की प्रजातियों और लगभग 5,000 जानवरों की प्रजातियों को नष्ट कर दिया।"

संघ प्रमुख ने आगे कहा, "जानवर भाग सकते थे। इसलिए वे बच गए। पौधे नहीं भाग सकते थे। यह इंसानों के जीने का तरीका नहीं है।" भागवत ने कहा कि बेहतर समझ होने का मतलब यह नहीं है कि इंसान पूरी सृष्टि के मालिक बन गए हैं। इसके बजाय उन्हें दूसरों के अस्तित्व को बचाए रखने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा, "आप सबसे अधिक समझदार हैं। आप प्रकृति की सीमाओं से आगे निकल चुके हैं और बहुत अच्छी जिंदगी जी रहे हैं। इसलिए, सबको बचाए रखना आपकी जिम्मेदारी है।" उन्होंने लोगों से अपील की कि वे सिर्फ दूसरों को जीने देने की सोच से आगे बढ़ें और इसके बजाय सक्रिय रूप से उन्हें जीने में मदद करें।

भागवत ने कहा, "हमें एक-दूसरे का ख्याल रखना होगा। हमें इस तरह ख्याल रखना होगा कि मेरी जिंदगी से किसी और की जिंदगी बनी रहे। मैं दूसरों को सहारा दूं। मैं सिर्फ दूसरों को जीने न दूं, बल्कि खुद भी जीऊं और दूसरों को भी जीने में मदद करूं। यही संदेश है।"

उन्होंने कहा कि व्यापक परिवर्तन की प्रतीक्षा करने के बजाय रोजमर्रा के व्यवहार में मामूली समायोजन के माध्यम से बदलाव की शुरुआत की जा सकती है।

मोहन भागवत ने आरएसएस के 'पंच परिवर्तन' कार्यक्रम का भी जिक्र किया और कहा कि इसके सिद्धांतों को पहले व्यक्ति को अपनाना होगा और फिर समाज में फैलाना होगा। उन्होंने कहा, "ये सिद्धांत मानवता को बचाए रखेंगे। ये पर्यावरण को बचाए रखेंगे। ये सृष्टि और अस्तित्व को बचाए रखेंगे। यही लक्ष्य है।"


इनपुट : आईएएनएस

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