धरती ने 47 सालों में खोया 12 ट्रिलियन टन से ज़्यादा बर्फ, सैटेलाइट तस्वीरों में सामने आया चौंकाने वाला सच
एक बड़ी वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक, 1979 से अब तक ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से करीब 12.5 ट्रिलियन टन (11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन) बर्फ पिघल चुकी है। यह इतनी बड़ी मात्रा है कि अगर इस बर्फ को अमेरिका के पूरे मुख्य भूभाग पर बिछा दिया जाए, तो वहां करीब 1.5 मीटर (5 फीट) मोटी बर्फ की चादर बिछ जाएगी।
'साइंटिफिक डेटा' जर्नल में बुधवार को प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, धरती की बढ़ती गर्मी दुनिया की दो सबसे बड़ी बर्फ की चादरों ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के पिघलने की रफ्तार को और तेज़ कर रही है। हैरानी की बात यह है कि इस पिघलने का करीब पांच-छठा हिस्सा सिर्फ गर्म हवा की वजह से नहीं हो रहा, बल्कि समुद्र का गर्म पानी नीचे और किनारों से बर्फ की चादरों को लगातार काट रहा है, जिससे ग्लेशियर बहते हुए सीधे समंदर में जा मिल रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि आने वाले समय में समुद्र के जलस्तर के लिए यह बेहद चिंताजनक संकेत है।
अध्ययन के सह-लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन के बर्फ वैज्ञानिक एरिक रिन्यो कहते हैं, "बर्फ की चादरें तेज़ी से पिघल रही हैं। हम ध्रुवीय क्षेत्रों को पिघला रहे हैं, दुनियाभर में समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और इससे तटीय इलाकों पर खतरा और बढ़ने वाला है।"
आंकड़े इतने बड़े कि दिमाग चकरा जाए, और असर इतना बड़ा कि करोड़ों लोग डूब सकते हैं
पिघली हुई यह बर्फ करीब 3 क्वाड्रिलियन गैलन (11.3 क्वाड्रिलियन लीटर) पानी में बदल चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसी वजह से 1979 से अब तक दुनियाभर में समुद्र का जलस्तर करीब एक इंच (3.1 सेंटीमीटर) बढ़ चुका है और यह सिर्फ बर्फ पिघलने की वजह से है, बाकी जलवायु कारण अलग से समुद्र का स्तर बढ़ा ही रहे हैं।
एक इंच सुनने में भले ही मामूली लगे, लेकिन अध्ययन की मुख्य लेखिका और इंग्लैंड की नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी की बर्फ वैज्ञानिक इनेस ओतोसाका बताती हैं कि समुद्र के जलस्तर में हर एक-तिहाई इंच (या एक सेंटीमीटर) की बढ़ोतरी के साथ, करीब 20 से 30 लाख और लोग साल में कम से कम एक बार बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं।
ओतोसाका के मुताबिक, ग्रीनलैंड का जैकबशवन ग्लेशियर अब रोज़ाना करीब 50 मीटर (164 फीट) तक पीछे खिसक रहा है।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी के नेतृत्व में ध्रुवीय वैज्ञानिकों की यह अंतरराष्ट्रीय टीम पहले सिर्फ यूरोपीय सैटेलाइट डेटा के आधार पर 1990 के दशक से बर्फ पिघलने का अध्ययन करती थी। लेकिन इस बार नासा के सैटेलाइट डेटा को भी शामिल करने से वैज्ञानिक अंटार्कटिका की बर्फ का हिसाब 1979 तक और ग्रीनलैंड का हिसाब 1972 तक पीछे ले जा पाए।
पिघलने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है
ओतोसाका कहती हैं, "यह बिल्कुल साफ है कि बर्फ की चादरें हर दशक में पहले से ज़्यादा बर्फ खो रही हैं, खासकर अगर आप यह देखें कि कितनी बर्फ बहकर समुद्र में जा रही है। और यह भी साफ है कि इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है।"
अध्ययन बताता है कि 1970, 1980 और 1990 के दशक तक बर्फ की चादरें अपेक्षाकृत स्थिर थीं, लेकिन उसके बाद पिघलने का सिलसिला शुरू हुआ और 2010 के दशक में यह रफ्तार वाकई तेज़ हो गई।
अध्ययन के सह-लेखक और नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी के ही एंड्रयू शेफर्ड कहते हैं, "यह चिंता की बात है, क्योंकि इससे पता चलता है कि यह बदलाव ग्लोबल वॉर्मिंग के दशकों बाद असर दिखा रहा है यानी हम उम्मीद कर सकते हैं कि यह आने वाले दशकों तक जारी रहेगा, भले ही हम धरती को गर्म करना अभी रोक भी दें।"
2020 से 2023 के बीच यह तेज़ रफ्तार थोड़ी थमती हुई नज़र आई थी, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि यह सिर्फ अल्पकालिक मौसमी बदलाव था, न कि कोई लंबे समय का रुझान। ओतोसाका बताती हैं कि अध्ययन में 2023 तक का डेटा शामिल किया गया था, लेकिन उन्होंने उसके बाद के आंकड़ों पर भी नज़र रखी है और पाया है कि पिघलने की रफ्तार फिर से तेज़ हो गई है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अंटार्कटिका में जो स्थिरता दिखी, उसकी बड़ी वजह पूर्वी अंटार्कटिका में हुई रिकॉर्ड बर्फबारी थी, जिसने पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ की चादर में हो रहे तेज़ पिघलाव की भरपाई कर दी जबकि पश्चिमी हिस्सा अपेक्षाकृत कम स्थिर माना जाता है।
रिन्यो के मुताबिक, यह तीन साल का ठहराव "आंकड़ों में बस एक छोटा-सा उतार-चढ़ाव भर था। लंबे समय का यह बढ़ता रुझान जलवायु परिवर्तन की ही देन है, और इसका खतरा बिल्कुल साफ नज़र आता है।"
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