रच दिया इतिहास नंगे पैर प्रचार करने वाले दीपांशु शौकीन ने DUSU में तोड़े दो बड़े रिकॉर्ड

Sep 19, 2026 - 16:57
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 रच दिया इतिहास नंगे पैर प्रचार करने वाले दीपांशु शौकीन ने DUSU में तोड़े दो बड़े रिकॉर्ड
Deepanshu Shaukeen

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 में एक ऐसी जीत दर्ज हुई है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। पीरागढ़ी के रहने वाले दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उपाध्यक्ष पद जीतकर न सिर्फ इतिहास रच दिया, बल्कि एक साथ दो बड़े रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए। पहला  DUSU के पूरे इतिहास में यह पहली बार है जब कोई निर्दलीय उम्मीदवार उपाध्यक्ष पद पर जीता हो। और दूसरा उन्होंने यह जीत रिकॉर्ड तोड़ मतों के अंतर से हासिल की। इससे पहले कभी कोई निर्दलीय प्रत्याशी इस पद तक पहुंच ही नहीं पाया था।

जीत का भरोसा पहले से था

19 सितंबर 2026 को नतीजे आने के बाद एनडीटीवी से खास बातचीत में दीपांशु ने बताया कि उन्हें इस बड़ी जीत का पूरा भरोसा था। उनका कहना है कि उन्होंने लगातार छात्रों के हक की आवाज उठाई, उनके बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनीं, और इसी भरोसे की बदौलत छात्रों ने उन पर जमकर वोटों की बारिश की। नतीजा यह रहा कि वे 20 हजार से भी ज्यादा वोटों के भारी अंतर से जीतकर उपाध्यक्ष बने।

"सिर्फ सस्पेंशन काफी नहीं, चाहिए असली इंसाफ"

बातचीत के दौरान दीपांशु ने सत्य निकेतन छात्रावास हादसे का मुद्दा भी बेबाकी से उठाया। उनका साफ कहना है कि यह हादसा प्रशासन की घोर लापरवाही का सीधा नतीजा है, और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सिर्फ निलंबन की कार्रवाई करके मामला रफा-दफा नहीं किया जा सकता उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। दीपांशु ने यह भी कहा कि जब तक पीड़ित छात्रों और उनके परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिल जाता, तब तक इंसाफ अधूरा ही रहेगा, और वे इस लड़ाई को आखिर तक लड़ने का वादा करते हैं।

बस कंडक्टर पिता का बेटा, जिसने चुनी अलग राह

दीपांशु की कहानी उन्हें और भी खास बनाती है। दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके के रहने वाले दीपांशु के पिता एक बस कंडक्टर हैं, जबकि उनकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर काम करती हैं। शहीद भगत सिंह कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले दीपांशु शुरू से ही छात्र राजनीति में उतरना चाहते थे जबकि उनके पिता का सपना था कि बेटा यूपीएससी की तैयारी करके IAS या IPS अफसर बने। दोनों अलग-अलग राहें, लेकिन दीपांशु ने अपने दिल की सुनी।

टिकट कटा, फिर भी नहीं मानी हार

दीपांशु के इस सफर में एक बड़ा मोड़ भी आया। शुरुआत में उन्होंने कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से टिकट मांगा और NSUI उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन भी भर दिया था। लेकिन बाद में संगठन ने उनसे नामांकन वापस लेने को कह दिया। ज्यादातर लोग शायद यहीं हार मान लेते, लेकिन दीपांशु ने पीछे हटने की बजाय निर्दलीय मैदान में डटे रहने का फैसला किया और आखिरकार अपने दम पर वो कर दिखाया, जो DUSU के इतिहास में आज तक कोई नहीं कर पाया था।

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