यूपीआई एमडीआर को लेकर ब्रोकर्स की चिंताओं की जांच करेगा सेबी
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा है कि पूंजी बाजार नियामक यूपीआई (UPI) फंड ट्रांसफर पर लागू होने वाले नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर स्टॉकब्रोकरों और एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) द्वारा उठाई गई चिंताओं की समीक्षा करेगा। जानिए सेबी चेयरमैन के बयान, ब्रोकर्स की चिंताओं और निवेशकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की पूरी रिपोर्ट।
मुंबई। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने गुरुवार को कहा कि नियामक नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क को लेकर स्टॉकब्रोकरों द्वारा उठाई गई चिंताओं की जांच करेगा।
नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट (एनएबीएफआईडी) इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव 2026 के इतर पत्रकारों से बातचीत में सेबी प्रमुख ने कहा कि इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं और नियामक इन चिंताओं पर विचार करेगा।
यह बयान ऐसे समय आया है जब एक दिन पहले ब्रोकर्स और ब्रोकिंग कंपनियों ने यूपीआई पर लागू नए एमडीआर ढांचे से उद्योग पर पड़ने वाली अतिरिक्त लागत को लेकर चिंता जताई थी।
इससे पहले, बुधवार को जेरोधा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नितिन कामथ ने व्यक्ति से व्यापारी (पी2एम) यूपीआई भुगतान पर लागू नए ढांचे का समर्थन करते हुए कहा था कि यूपीआई के व्यापक स्तर पर अपनाए जाने के बाद यह कदम उठाया जाना आवश्यक हो गया था।
हालांकि, कामथ ने यह भी कहा था कि निवेश और ब्रोकिंग जैसे कुछ उपयोग मामलों में प्रस्तावित एमडीआर संरचना व्यावहारिक नहीं लगती। उन्होंने कहा कि कई बार ग्राहक अपने ब्रोकिंग खाते में यूपीआई के जरिए धनराशि जमा करते हैं, लेकिन बाद में कोई ट्रेड नहीं करते। ऐसी स्थिति में ब्रोकर्स को शुल्क का बोझ उठाना पड़ सकता है, जबकि उन्हें कोई राजस्व प्राप्त नहीं होता।
उन्होंने सुझाव दिया था कि ब्रोकिंग से जुड़े यूपीआई भुगतानों के लिए कम ट्रांजैक्शन लिमिट पर विचार किया जाना चाहिए।
नितिन कामथ के अनुसार, ब्रोकर्स यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि यूपीआई के माध्यम से उनके खाते में भेजी गई राशि अंततः किसी ट्रेड में उपयोग होगी। चूंकि वे ग्राहकों को ट्रेड करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, इसलिए यदि एमडीआर का शुल्क ग्राहकों पर नहीं डाला जा सकता तो ब्रोकर्स को बिना किसी आय के अतिरिक्त लागत उठानी पड़ सकती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि यदि 10,000 ग्राहक एक महीने में 2 लाख रुपए के 50-50 यूपीआई ट्रांसफर करें और बाद में कोई ट्रेड निष्पादित न करें, तो प्रस्तावित एमडीआर ढांचे के तहत किसी ब्रोकर पर लगभग 2 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आ सकता है।
इसके अलावा, कामथ ने त्रैमासिक निपटान (क्वाटर्ली सेटलमेंट - क्यूएस) नियमों का भी उल्लेख किया। सेबी के इस नियम के तहत ब्रोकर्स को ग्राहकों की अप्रयुक्त धनराशि हर महीने या तिमाही में वापस करनी होती है।
उन्होंने कहा कि ग्राहक अक्सर यह धनराशि दोबारा अपने ब्रोकिंग खातों में जमा करते हैं और इन पुनः जमा की गई रकम का बड़ा हिस्सा यूपीआई के माध्यम से आता है। इससे बार-बार फंड ट्रांसफर पर ब्रोकर्स को बार-बार शुल्क वहन करना पड़ सकता है, जबकि उनके कारोबार में कोई अतिरिक्त आय नहीं होती।
इनपुट : आईएएनएस
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