कैंची धाम से दुनिया तक फैली ख्याति, फिर वृंदावन में ही क्यों नीम करौली बाबा ने ली महासमाधि

Sep 10, 2026 - 18:00
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कैंची धाम से दुनिया तक फैली ख्याति, फिर वृंदावन में ही क्यों नीम करौली बाबा ने ली महासमाधि
Neem Karoli Baba

नई दिल्ली। नीम करौली बाबा का नाम आते ही सबसे पहले उत्तराखंड का कैंची धाम याद आता है। पहाड़ों के बीच बसा यह आश्रम आज देश-दुनिया में बाबा के भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है लेकिन बाबा की कहानी सिर्फ कैंची धाम तक सीमित नहीं है। उनके जीवन का आखिरी पड़ाव वृंदावन रहा, जहां उन्होंने 11 सितंबर 1973 को देह त्यागी और बाद में वहीं उनकी समाधि बनाई गई। 

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम बाबा की प्रमुख तपोस्थली और आश्रम के रूप में जाना जाता है। बाबा ने यहां साधना और सेवा का ऐसा वातावरण बनाया, जिसने धीरे-धीरे देश-विदेश के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। आज यह बाबा के भक्तों के लिए बेहद खास स्थान है।

नीम करौली बाबा की पहचान उनके सादे जीवन और कंबल से भी जुड़ी रही। अक्सर वे कंबल ओढ़े नजर आते थे, इसलिए भक्त उन्हें प्यार से ‘कंबल वाले बाबा’ भी कहते थे। उनके व्यक्तित्व में एक खास बात यह थी कि वे बड़े-बड़े उपदेशों की बजाय सरल शब्दों में जीवन की बातें समझाते थे।

उनकी शिक्षाओं में प्रेम और सेवा को विशेष महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि उनके अनुयायी आज भी उनके संदेशों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करते हैं। बाबा के आश्रमों में आने वाले लोगों के लिए आध्यात्मिकता के साथ-साथ सेवा की भावना भी महत्वपूर्ण रही है।

समय के साथ कैंची धाम की प्रसिद्धि भारत से बाहर तक पहुंची। खासकर अमेरिका और दूसरे देशों में रहने वाले कई लोग बाबा की शिक्षाओं से प्रभावित हुए। एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग तक का नाम बाबा से जुड़ी चर्चाओं में सामने आता रहा है।

कैंची धाम बाबा की तपोस्थली और आश्रम है जबकि उनकी मुख्य समाधि वृंदावन में है। बाबा का जीवन भगवान हनुमान की भक्ति से गहराई से जुड़ा माना जाता है। वृंदावन भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध वृंदावन सदियों से संतों और साधकों की भूमि रहा है।

1973 में बाबा की तबीयत खराब रहने लगी थी। सितंबर की शुरुआत में वे आगरा की ओर गए थे। इसी दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। बताया जाता है कि उन्हें ट्रेन से वृंदावन लाया गया। उन्हें इलाज के लिए रामकृष्ण मिशन अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा ने वृंदावन में अपनी देह त्याग दी। उनके भक्त इसे सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि 'महासमाधि' के रूप में याद करते हैं। बाबा की अंतिम यात्रा भी उसी वृंदावन में पूरी हुई, जिससे उनका आध्यात्मिक रिश्ता लंबे समय से जुड़ा था।

इनपुट : आईएएनएस

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