Amrita Pritam: कलम की बेबाक आवाज अमृता प्रीतम; जिन्होंने अपनी शर्तों पर लिखी इश्क, आजादी और समाज की बंदिशें तोड़ने की अमर कहानी

20वीं सदी के भारतीय साहित्य में अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपनी कलम और जीवन दोनों से पितृसत्तात्मक समाज के बनाए हर दायरे को चुनौती दी। 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में जन्मीं अमृता ने उस दौर में स्त्री की आकांक्षाओं, प्रेम, अकेलेपन और शारीरिक व मानसिक स्वतंत्रता की बात की जब औरत का खुलकर लिखना भी बगावत समझा जाता था। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के भयावह दर्द को उन्होंने अपनी कालजयी रचना 'अज्ज आखां वारिस शाह नूं' (Ajj Aakhaan Waris Shah Nu) में ऐसा पिरोया कि वह बंटवारे के विलाप का वैश्विक दस्तावेज बन गई। जानिए अमृता प्रीतम के साहित्य, प्रेम, संघर्ष और बगावती मिजाज से जुड़ी पूरी विस्तृत जीवन यात्रा।

Aug 30, 2026 - 11:26
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Amrita Pritam: कलम की बेबाक आवाज अमृता प्रीतम; जिन्होंने अपनी शर्तों पर लिखी इश्क, आजादी और समाज की बंदिशें तोड़ने की अमर कहानी

नई दिल्ली। कुछ लोग लिखते हैं ताकि उनकी बातें कागज पर दर्ज हो जाएं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जिनकी लिखी हुई बातें लोगों के दिल में उतर जाती है। अमृता प्रीतम उन्हीं चुनिंदा लेखकों में से एक थीं। उन्होंने सिर्फ कविताएं और कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि अपने समय की औरत के मन, उसके दर्द, प्रेम, अकेलेपन और सपनों को शब्द दिए। उन्होंने जिंदगी को भी उसी बेबाकी से जिया, जिस बेबाकी से लिखा। समाज की बनाई लकीरों को मानने के बजाय उन्होंने अपनी राह खुद चुनी।

31 अगस्त 1919 को तत्कालीन पंजाब के गुजरांवाला में जन्मीं अमृता प्रीतम का बचपन आसान नहीं था। महज 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां को खो दिया। इस कमी ने उनके भीतर एक गहरी तन्हाई पैदा की और इसी तन्हाई में कागज और कलम उनके साथी बन गए। छोटी उम्र से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। महज 16 साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह 'अमृत लहरें' प्रकाशित हुआ।

उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ आया 1947 के बंटवारे के समय। लाहौर उनका अपना शहर था, लेकिन हिंसा और दंगों ने लाखों लोगों की तरह उन्हें भी अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इसी सफर में उनके भीतर से निकली कविता 'अज्ज आखां वारिस शाह नूं' ने बंटवारे के दर्द को ऐसी आवाज दी, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ सुना गया। इस कविता में उन्होंने खास तौर पर उन औरतों की पीड़ा को सामने रखा, जो बंटवारे की हिंसा में अपना घर, परिवार और सम्मान तक खो बैठी थीं।

अमृता की लेखनी की खासियत यही थी कि वह बड़े से बड़े सामाजिक मुद्दे को इंसानी भावनाओं के जरिए सामने रखती थीं। उनके चर्चित उपन्यास 'पिंजर' में भी बंटवारे की पृष्ठभूमि है, लेकिन कहानी के केंद्र में एक औरत है—पूरो। उसका जीवन दंगों की भेंट चढ़ जाता है और वह अपनी पहचान, परिवार और सपनों के बीच फंस जाती है। अमृता ने पूरो के जरिए सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं कही, बल्कि उन हजारों महिलाओं की आवाज को शब्द दिए, जिनकी जिंदगी बंटवारे की हिंसा में बदल गई थी।

लेकिन अमृता की पहचान सिर्फ बंटवारे पर लिखने वाली लेखिका की नहीं थी। उन्होंने प्रेम को भी उतनी ही गहराई से महसूस किया और लिखा। उनकी जिंदगी में साहिर लुधियानवी का नाम बेहद खास रहा। दोनों के बीच ऐसा रिश्ता था जिसे शायद शब्दों में पूरी तरह बांधना मुश्किल है। मुलाकातें कम थीं, लेकिन एहसास गहरा था। अमृता ने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में साहिर से जुड़े कई किस्से बेहद खूबसूरती से लिखे। साहिर के कमरे से चले जाने के बाद उनकी बुझी हुई सिगरेटों को संभालकर रखना और उन सिगरेट के टुकड़ों में साहिर की मौजूदगी महसूस करना, उनके उस अनकहे प्रेम की कहानी कहता है।

हालांकि यह प्रेम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका। बाद में उनकी जिंदगी में चित्रकार इमरोज आए। इमरोज और अमृता का रिश्ता भी अपने आप में अनोखा था। दोनों ने बिना शादी के साथ रहते हुए एक-दूसरे का साथ निभाया। इमरोज अमृता के जीवन में सिर्फ साथी नहीं, बल्कि उनके मौन को समझने वाले इंसान थे। अमृता रात में लिखती थीं और इमरोज कई बार रात के एक बजे उनके लिए चाय बनाकर रख देते थे। बिना किसी शोर-शराबे के चलने वाला यह रिश्ता प्रेम की अपनी अलग परिभाषा बन गया।

अमृता ने अपने लेखन में औरत को सिर्फ किसी रिश्ते की पहचान के रूप में नहीं देखा। उनकी कहानियों और कविताओं में औरत अपनी इच्छाओं, फैसलों और भावनाओं के साथ मौजूद है। यही बात उन्हें अपने दौर से आगे की लेखिका बनाती है। उन्होंने समाज के उन नियमों पर सवाल उठाए, जिन्हें अक्सर बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया जाता था।

अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मविभूषण जैसे सम्मान मिले, लेकिन उनकी असली पहचान किसी पुरस्कार से बड़ी थी। वह उन पाठकों के दिल में बसीं, जिन्हें उनके शब्दों में अपना दर्द, अपना प्रेम और अपना संघर्ष दिखाई दिया।

31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी कलम की आवाज आज भी सुनाई देती है।


इनपुट : आईएएनएस

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