आस्था और पर्यावरण का संतुलन: 'विसर्जन गलत नहीं, सामग्री का चुनाव अहम'; प्लास्टिक और रेज़िन के दौर में मिट्टी-धातुओं की ओर लौटने की जरूरत

भारतीय समाज में गणेश चतुर्थी, नवरात्र में सांझी स्थापना अथवा मंदिर की खंडित मूर्तियों के जल विसर्जन की परंपरा सदियों पुरानी है। प्राचीन काल में यह विसर्जन प्राकृतिक संतुलन के अनुकूल था, क्योंकि तब प्रतिमाएं शुद्ध मिट्टी, तांबे या पीतल जैसी धातुओं से बनती थीं, जिनका जलस्रोतों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता था। जानिए पारंपरिक मूर्ति विसर्जन, आधुनिक रसायनों के पर्यावरणीय प्रभाव और शुद्ध मिट्टी व धातुओं के विकल्पों पर विस्तृत विश्लेषण।

Sep 11, 2026 - 12:49
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आस्था और पर्यावरण का संतुलन: 'विसर्जन गलत नहीं, सामग्री का चुनाव अहम'; प्लास्टिक और रेज़िन के दौर में मिट्टी-धातुओं की ओर लौटने की जरूरत

हमारे यहाँ पहले से ही परंपरा रही है कि जब नवरात्रे आते हैं तो हम सांझी रखते हैं, गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मूर्ति स्थापित करते हैं और जब भी हमारे मंदिर में कोई मूर्ति खंडित हो जाती है, तो उसे पानी में बहाते हैं, यानी उसका विसर्जन करते हैं।


यह परंपरा पुराने समय में बिल्कुल ठीक थी, क्योंकि उस समय जो मूर्तियाँ बनाई जाती थीं, वे तांबे, पीतल और मिट्टी की होती थीं और उनमें किसी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता था। तांबा और पीतल वैसे भी हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माने जाते हैं, इसलिए पानी में जाने से उनसे कोई खास नुकसान नहीं होता था। भले ही कोई फायदा न हो, लेकिन नुकसान नहीं था। वहीं मिट्टी एक प्राकृतिक चीज़ है, इसलिए वह पानी और प्रकृति में जाकर आसानी से मिल जाती थी।


इसलिए पुराने समय में मूर्तियों का विसर्जन करना सही था, क्योंकि उसका कोई साइड इफेक्ट नहीं था।
लेकिन आज के समय में जो मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, उनमें रेज़िन, केमिकल और केमिकल कलर्स का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मूर्तियाँ प्लास्टिक से भी बनाई जाती हैं। जब इन मूर्तियों का पानी में विसर्जन किया जाता है, तो इससे पानी प्रदूषित होता है। इसका असर पानी में रहने वाले जीवों के साथ-साथ हमारी प्रकृति और हमारे जीवन पर भी पड़ता है।


इसलिए पानी में मूर्तियों का विसर्जन करना गलत नहीं है, लेकिन अब हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस मूर्ति का हम विसर्जन कर रहे हैं, वह मिट्टी की हो, प्योर मिट्टी की हो या फिर तांबे, कॉपर या पीतल की हो।


प्लास्टिक और रेज़िन से बनी मूर्तियों से हमें बचना चाहिए, क्योंकि इन्हें पानी में विसर्जित करने से हमारी ही प्रकृति और हमारा ही जीवन प्रभावित होता है।
तो मूर्तियों को पानी में विसर्जित करना गलत नहीं है, बस समय के साथ हमें अपनी परंपराओं में थोड़ा बदलाव लाकर उन्हें सही तरीके से निभाना चाहिए।

(ज्योतिषाचार्या प्रियांशी सिरोही)

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