सती से महाशक्ति तक: मन, अहंकार और मुक्ति का आध्यात्मिक विज्ञान
पुराणों में कथा आती है कि माता पार्वती (सती रूप में) को भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए १०८ जन्म (अनेक कठिन तपस्याएँ) लेने पड़े। यह कथा केवल एक इतिहास नहीं, बल्कि जीव (मन) के पुनर्जन्म और उसकी मुक्ति का पूरा आध्यात्मिक विज्ञान है:
दक्ष प्रजापति केवल एक पौराणिक राजा नहीं, बल्कि 'अहंकार' (Ego), देहाध्यास (कर्मकांड) और बुद्धि के संकीर्ण तर्क के प्रतीक हैं।
दक्ष क्यों रोकते हैं?
दक्ष (अहंकार) चाहता है कि मन (सती) सदा संसार के नियमों, मान-प्रतिष्ठा, कुल-मर्यादा और बाह्य भोगों में ही उलझा रहे। शिव (आत्मा) निष्काम, दिगंबर, श्मशानवासी और अद्वैत हैं। अहंकार (दक्ष) कभी नहीं चाहता कि मन (सती) अपनी अंतरात्मा (शिव) की ओर मुड़े, क्योंकि जिस दिन मन आत्मा से मिल जाएगा, उस दिन अहंकार (दक्ष) का साम्राज्य समाप्त हो जाएगा। दक्ष ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उसमें शिव (आत्मा) के लिए कोई स्थान नहीं रखा।
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सती का हठ: सती जी बिना बुलाए, शिव जी के मना करने के बाद भी अपने पिता के घर (अहंकार के क्षेत्र में) चली गईं।
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अग्निदाह का रहस्य: जब सती ने देखा कि पिता के यज्ञ में शिव (आत्मा) का कोई आदर नहीं है, तो उन्हें अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। उन्हें बोध हुआ कि अहंकार (दक्ष) और मन (सती) का यह मिलाप व्यर्थ है। उन्होंने उसी यज्ञ की योग-अग्नि में अपने शरीर को भस्म कर दिया। यह सती के देहाध्यास (शरीर ही मैं हूँ मानने के भ्रम) का अंत था। जब मन को समझ आता है कि अहंकार (दक्ष) के पास आत्मा का प्रकाश नहीं है, तो वह अपने पुराने रूप को नष्ट कर देता है।
सती के देह-त्याग के बाद शुरू हुई मन की सबसे लंबी यात्रा—१०८ जन्मों का चक्र।
ज्योतिषीय महत्त्व
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आकाश मंडल में 27 नक्षत्र हैं और प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण (पाद) होते हैं। 108 पद।
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संपूर्ण ब्रह्मांड और काल-चक्र इन्हीं 108 चरणों में सिमटा हुआ है।
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मन (चंद्रमा) जब अपनी यात्रा शुरू करता है, तो उसे इन सभी 108 नक्षत्र-चरणों और 3 गुणों (सत्व, रज, तम) के ताने-बाने से गुज़रना पड़ता है।
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जब तक मन इन 108 बिंदुओं में वासना और कर्म-बंधन बनाता रहता है, तब तक पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है।
सृष्टि का बनना: चंद्रमा की कलाएँ
अमावस्या को चंद्रमा दिखाई नहीं देता (केवल सूर्य रहता है)। लेकिन जैसे ही चंद्रमा सूर्य से दूरी बनाता है, उसकी कलाएँ (प्रतिपदा, द्वितीया...) बढ़ने लगती हैं और एक काल्पनिक दुनिया (रातों का सौंदर्य, प्रकाश, छाया) रचने लगती है।
जब शुद्ध आत्मा (सूर्य) से मन (चंद्रमा) स्वयं को थोड़ा अलग अनुभव करता है, तो 'अहम' (I am) का विचार उत्पन्न होता है। चंद्रमा रूपी मन अब सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके अपनी काल्पनिक सृष्टि (संकल्प-विकल्प) रचने लगता है। यही उत्पत्ति है। सूर्य (आत्मा) एक ही है, लेकिन चंद्रमा (मन) उससे अनगिनत प्रतिबिंब और छायाएँ रच देता है।
संसार का टिका रहना
पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पूरा चमकता है और समुद्र में तीव्र ज्वार-भाटा लाता है।
जब चंद्रमा (मन) सूर्य (आत्मा) के प्रकाश को पूरी तरह अपना मान लेता है, तो वह अत्यंत बलवान होकर संसार को सच दिखाने लगता है। मन की यही घटती-बढ़ती भावनाएँ (सुख-दुःख, राग-द्वेष, इच्छाएँ) संसार रूपी ज्वार-भाटे (स्थिति) को बनाए रखती हैं। ज्योतिष में भी चंद्रमा ही व्यक्ति की 'मानसिक स्थिति' और 'अनुभूति' का कारक है—जैसा चंद्रमा का असर, वैसी आपकी दुनिया।
अमावस्या के दिन चंद्रमा पूरी तरह सूर्य में समा जाता है। तंत्र में इसे 'शिव-शक्ति समागम' कहा जाता है।
जब मन (पार्वती) विचार-मंथन द्वारा शांत होकर अपनी आत्मा (शिव) में विलीन हो जाता है, तो सारे भ्रम, दुःख और पुनर्जन्म समाप्त हो जाते हैं। इसे ही 'उपशम' या 'मोक्ष' कहते हैं।
चंद्रमा को जब तक लगता है कि "मैं चमक रहा हूँ", तब तक उसमें अहंकार रहता है। लेकिन जैसे ही चंद्रमा को यह ज्ञान होता है कि "मेरा अपना कोई प्रकाश नहीं, मुझमें जो भी शीतलता और चमक है, वह केवल सूर्य (शिव) की किरणों का प्रतिबिंब है", उसका अहंकार पिघल जाता है।
महादेवी का प्रकटन और परम बोध
प्रकट हुईं माँ 'महादेवी' बन, दसों महाविद्या का आनंद!
दश भुजाओं में आयुध चमके, सिंह-पीठ पर परम प्रकाश, दिशा-दिशा का तम छँट भागा, जागा अलौकिक नया उल्लास। शिव की इच्छा, क्रिया, ज्ञान बन, उतरा आद्या-रूप अनूप, 'ह्रीं' बीजाक्षर गूँज उठा नभ, प्रगटा महा-शक्ति का रूप!
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