कभी 'डॉग फ्रूट' रहे एवोकाडो की देश में बढ़ी मांग, आयात 15 हजार टन तक पहुंचा
मुंबई। कभी भारत में पेड़ों पर पककर गिर जाने वाला एवोकाडो कुत्तों के खाने के काम आता था, इसीलिए इसे 'डॉग फ्रूट' तक कहा जाता था। अब यही फल तेजी से भारतीय बाजार में लोकप्रिय होकर पसंदीदा फल के रूप में जगह बना रहा है। बढ़ती मांग के बीच किसान इसकी व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं रेस्तरां और खाद्य कारोबार भी स्थानीय उत्पादन बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं।
बीबोसी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल करीब 15 हजार टन एवोकाडो का आयात होता है, जबकि उत्पादन सिर्फ 8 से 9 हजार टन के आसपास है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मांग और आपूर्ति के इस बड़े अंतर में किसानों के लिए कारोबार का बड़ा अवसर मौजूद है। खासकर कॉफी और काली मिर्च जैसी पारंपरिक फसलों पर जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ने के कारण फसल विविधीकरण जरूरी हो गया है।
पोषण से भरपूर फल
एवोकाडो में स्वस्थ वसा, फाइबर, पोटैशियम और फोलेट अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें विटामिन E, K, C और B-समूह के कुछ विटामिन भी होते हैं। इसकी खासियत यह है कि इसमें मौजूद वसा मुख्यतः मोनोअनसैचुरेटेड फैट होती है। यही पोषण गुण इसे सलाद, सैंडविच और अन्य व्यंजनों में लोकप्रिय बना रहे हैं।
मांग बढ़ी तो बदली खेती
केरल के वायनाड स्थित कॉटयाड प्लांटेशन में एवोकाडो पहले मुख्य फसल के रूप में नहीं लगाया जाता था। कॉफी के पेड़ों को छाया देने के लिए इसे लगाया गया था। लेकिन करीब 15 साल पहले इसकी मांग बढ़ने लगी। कंपनी के समूह प्रबंधक मधू बोगिया के मुताबिक जब 2011 के आसपास बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने त्वचा की देखभाल में एवोकाडो के इस्तेमाल का उल्लेख किया, जिसके बाद इसकी कीमतों में तेजी आई।
अब कॉटयाड प्लांटेशन ने करीब 40 एकड़ में एवोकाडो लगाया है। पिछले साल यहां 10 से 15 टन फल मिला और अगले तीन-चार वर्षों में उत्पादन 40 से 50 टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
देसी के मुकाबले विदेशी किस्मों की भारी मांग
मुंबई के रेस्तरां भी एवोकाडो की बढ़ती मांग से जुड़े हैं। हॉस्पिटैलिटी के कार्यकारी शेफ हरमन शादमान के अनुसार, देसी किस्मों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन मौसम, उपलब्धता, स्वाद, बनावट और पकने की स्थिति में काफी अंतर है। उनके रेस्तरां आयातित एवोकाडो को प्राथमिकता देते हैं। इंडो-इजराइल एवोकाडो नर्सरी के संस्थापक हरविंदर सिंह पांच वर्षों में यह देखकर कि किसानों को गुणवत्तापूर्ण पेड़ नहीं मिल रहे हैं, वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं।
आसान नहीं व्यावसायिक खेती
एवोकाडो की व्यावसायिक खेती आसान नहीं है। बीज से तैयार पेड़ फल देने में 10-12 साल लेते हैं, जबकि कलम (ग्राफ्टेड) किए गए पौधे 3-4 साल में फल देने लगते हैं। पेड़ों की नियमित छंटाई जरूरी होती है ताकि वे 25 फीट तक ऊंचे न हो जाएं। भारत में विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल किस्में विकसित की जा रही हैं। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु ने देश की जलवायु परिस्थितियों के लिए दो उपयुक्त किस्में विकसित की हैं।
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