गायों पर बरसाती बीमारियों का संकट; गलघोंटू से लेकर थनैला तक... जानें लक्षण, बचाव और अचूक उपाय
देश में भैंसों से ज्यादा गायों का दूध उत्पादन होता है. संख्या भी भैंसों के मुकाबले गायों की ज्यादा है. आज देश में देसी नस्ल की ऐसी-ऐसी गाय हैं जिनके दूध से बना घी हजारों रुपये किलो के हिसाब से बिक रहा है. लेकिन बरसात के दौरान गाय जल्दी बीमारियों की चपेट में आती हैं. या ये कह लें कि बरसाती बीमारियां गायों पर ज्यादा अटैक करती हैं. लेकिन कुछ ऐसे उपाय हैं जिन्हें अपनाकर गायों को इन बीमारियों से बचाया जा सकता है. जिससे न तो इलाज पर खर्च करना होगा और न ही उत्पादन कम होने का नुकसान सहना पड़ेगा.
क्योंकि गाय का सिर्फ घी ही नहीं दूध भी उत्तम माना जाता है. भैंस के मुकाबले गाय के दूध को कहीं ज्यादा गुणकारी बताया गया है. रेट के मामले में भी बात करें तो देसी घी गाय का सबसे ज्यादा महंगा बिकता है. देश के दूध कारोबार में गायों का खासा आर्थिक योगदान है. लेकिन बाढ़-बरसात के दौरान सबसे ज्यादा बीमारियां गायों को ही परेशान करती हैं.
गायों की बरसाती बीमारियां और लक्षण
गलघोंटू बुखार
सांस लेने में दिक्कत, गले में सूजन होती है. एंटीबायोटिक दवा और इंजेक्शन इलाज है. साथ ही बरसात के मौसम से पहले वैक्सीनेशन कराना चाहिए.
थनैला
थनों में दिक्कत, दूध में छर्रे आना, थनों में सूजन इस बीमारी के लक्षण है. अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं. पशु के दूध और थन की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए.
लंगड़ा बुखार
106-107 डिग्री तक बुखार होना, पशु के पैरों में सूजन, पशु का लंगड़ा कर चलना. बरसात से पहले वैक्सीनेशन करवाना और बीमार पशुओं को हेल्दी पशुओं से दूर रखना.
मिल्क फीवर
शरीर का तापमान कम हो जाना, सांस लेने में परेशानी होना. प्रसव के 15 दिन तक पूरा दूध न निकालें और पशु को कैल्शियम से भरा आहार और सप्लीमेंट दें.
खुरपका मुहंपका
मुंह और खुर में दाने होते हैं, दाने छाला बनकर फट जाते हैं और घाव गहरा हो जाता है. फौरन ही डॉक्टर को दिखाना चाहिए बरसात से पहले टीकाकरण कराना चाहिए और बारिश में पशु को खुले में चरने नहीं देना चाहिए.
प्लीहा (एंथ्रेक्स)
पेशाब और गोबर में खून आना, तेज बुखार होना. पशु चिकित्सक से संपर्क कर स्थिति के हिसाब से उपचार करना चाहिए. इस रोग से बचाने के लिए वक्त रहते टीकाकरण करा लेना चाहिए.
यक्ष्मा (टीबी)
पशु सुस्त हो जाता है, सूखी खांसी और नाक से खून आने लगता है. रोग के लक्षण दिखते ही पशु को अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए. पशु के आहार का खास ध्यान रखना चाहिए.
संक्रामक गर्भपात
पांच-छह महीने में योनिमुख से तरल गिरता है, बच्चे होने के लक्षण दिखते हैं, लेकिन गर्भपात हो जाता है. पशु की ठीक से सफाई करनी चाहिए, डीवॉर्मिंग करनी चाहिए और पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. छह से आठ महीने के पशु को ब्रुसेला का टीका लगवाना चाहिए.
अफारा
पशु का बायां पेट फूल जाता है, पेट को थपथपाने पर ढोलक की आवाज आती है.
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