श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्म की सिद्धि के लिए जरूरी हैं ये 5 कारक, जानिए सफलता के पीछे छिपा गहरा रहस्य
नई दिल्ली । श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन को समझने और सही दिशा में आगे बढ़ने की सीख देने वाला ऐसा ज्ञान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्तव्य और उसके परिणामों को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। इन्हीं में से एक है कर्म की सिद्धि के लिए बताए गए पांच कारक। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इसके बारे में जानकारी दी है।
केवल मेहनत नहीं, इन 5 तत्वों से पूरा होता है हर कर्म
अक्सर हम किसी काम में सफलता मिलने पर पूरा श्रेय खुद को देते हैं और असफलता मिलने पर किस्मत को दोष देने लगते हैं। लेकिन गीता के अनुसार किसी भी कर्म के पूरा होने के पीछे केवल एक व्यक्ति की मेहनत नहीं, बल्कि पांच तत्वों की भूमिका होती है। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 14 में इन पांच कारकों का उल्लेख मिलता है।यह श्लोक है, अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।। कर्म की सिद्धि का पहला कारक अधिष्ठान है, जिसका अर्थ है शरीर। जिस शरीर के माध्यम से हम कोई काम करते हैं, वही कर्म का आधार बनता है।
जानिए सफलता के पीछे छिपा गहरा रहस्य
दूसरा कारक है कर्ता, यानी वह व्यक्ति या जीवात्मा जो किसी काम को करने का संकल्प लेता है। किसी भी कार्य को शुरू करने के पीछे व्यक्ति की इच्छा, सोच और निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं।तीसरा कारक है करण यानी इंद्रियां और साधन। इसका अर्थ है वे साधन या उपकरण, जिनकी मदद से कोई काम पूरा किया जाता है। इसमें हमारी आंखें, कान, हाथ-पैर जैसी इंद्रियां शामिल हैं।चौथा कारक है चेष्टा, यानी किसी काम को पूरा करने के लिए किए जाने वाले अलग-अलग प्रयास। केवल इच्छा रखने से सफलता नहीं मिलती, उसके लिए लगातार मेहनत और सही दिशा में कोशिश करना जरूरी है।पांचवां कारक है दैव। इसका संबंध उन परिस्थितियों और प्रभावों से है, जो पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं होते। इसमें दैवीय व्यवस्था, प्रकृति के नियम और पूर्व कर्मों से जुड़ी पारंपरिक व्याख्याएं शामिल हैं।
इनपुट : आईएएनएस
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