टाटा ट्रस्ट्स की चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को चुनौती, कास्टिंग वोट पर उठाया सवाल
टाटा संस बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बनाए रखने का प्रस्ताव 4-1 के बहुमत से पास कर दिया, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले के खिलाफ वोट किया। अब टाटा ट्रस्ट्स ने इस पूरे प्रस्ताव को ही अमान्य करार दे दिया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) के मुताबिक, किसी भी बड़े फैसले के लिए उनके दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों की सहमति जरूरी है वही नियम, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने साइरस मिस्त्री केस में सही ठहराया था। चंद्रशेखरन और परिवार के ट्रस्ट्स के बीच की यह टकराहट, जो कंपनी के करीब दो-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं, अब कॉर्पोरेट गवर्नेंस और संभावित लिस्टिंग को लेकर गहराते तनाव को सामने ला रही है। मामला अब अदालत तक पहुंचता दिख रहा है, जिसके लिए दोनों पक्षों ने हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकीलों को मैदान में उतार दिया है।
नोएल टाटा खेमे ने रविवार को साफ कहा कि टाटा ट्रस्ट्स के वे विशेष अधिकार, जिनका इस्तेमाल 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाने के लिए किया गया था और जिन्हें 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था, महज एक कास्टिंग वोट के ज़रिए खत्म नहीं किए जा सकते।
दरअसल गुरुवार को हुई बोर्ड मीटिंग में टाटा संस के डायरेक्टर हरीश मनवानी ने अपने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल करते हुए चंद्रशेखरन को तीसरी बार पांच साल का कार्यकाल दे दिया था यह तब हुआ जब टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट डाला था।
रविवार को टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस और चंद्रशेखरन के वकील और पूर्व सॉलिसिटर-जनरल हरीश साल्वे की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि कास्टिंग वोट जायज़ था, क्योंकि अगर टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों के वोट बराबर रहते, तो कंपनी में गतिरोध पैदा हो जाता और कामकाज ठप पड़ जाता।
गौरतलब है कि टाटा संस बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल के पक्ष में वोट दिया था।
टाटा ट्रस्ट्स के बयान में कहा गया, "न तो कोई गतिरोध था, न ही कामकाज ठप पड़ा।" ट्रस्ट्स का कहना है कि यह प्रस्ताव कानूनी तौर पर अमान्य है और इसका कोई असर नहीं है।
बयान में आगे कहा गया कि कंपनी के अपने ही संविधान से मिले सुरक्षात्मक अधिकार का इस्तेमाल करना कोई गतिरोध नहीं है बल्कि यह इस बात का सबूत है कि संविधान ठीक उसी तरह काम कर रहा है, जैसा उसे बनाया गया था।
बयान में यह भी कहा गया, "बोर्ड ने एक सवाल रखा, और AoA ने उसका जवाब 'ना' में दिया।"
कानूनी दांव-पेंच की यह बारीकी साफ इशारा कर रही है कि यह मामला अब अदालत की दहलीज़ तक पहुंचेगा, और दोनों पक्ष एक लंबी कानूनी लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आ रहे हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)