आस्था और प्रकृति का संतुलन; प्लास्टिक-रेज़िन के दौर में मिट्टी और धातुओं की ओर लौटने की जरूरत, परंपराओं में समय के साथ बदलाव जरूरी

भारतीय सनातन संस्कृति में गणेश चतुर्थी, नवरात्र में सांझी स्थापना या खंडित मूर्तियों के जल विसर्जन की परंपरा युगों से चली आ रही है। प्राचीन काल में यह विसर्जन परंपरा पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल थी, क्योंकि उस समय मूर्तियां शुद्ध मिट्टी, तांबे और पीतल जैसी प्राकृतिक धातुओं से बनती थीं जो पानी में घुलकर प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती थीं। जानिए मूर्ति विसर्जन की परंपरा, आधुनिक प्रदूषण के खतरे और ईको-फ्रेंडली विकल्पों पर विस्तृत रिपोर्ट।

Sep 13, 2026 - 11:03
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आस्था और प्रकृति का संतुलन; प्लास्टिक-रेज़िन के दौर में मिट्टी और धातुओं की ओर लौटने की जरूरत, परंपराओं में समय के साथ बदलाव जरूरी

सनातन परंपरा में प्रकृति और ईश्वर को कभी अलग नहीं माना गया। हमारे हर पर्व, त्योहार और धार्मिक विधान के मूल में प्रकृति का गहरा सम्मान छुपा हुआ है। चाहे गणेश चतुर्थी पर बप्पा की स्थापना हो, नवरात्र में सांझी मैया का पूजन हो या फिर मंदिर में वर्षों तक पूजित रही खंडित मूर्तियों का सम्मानपूर्वक जल में विसर्जन—यह परंपरा सदियों से भारतीय जनमानस के जीवन का अभिन्न अंग रही है।

लेकिन आज के भौतिकवादी दौर में इस पावन परंपरा के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है: क्या हमारी आधुनिक विसर्जन शैली हमारी नदियों, तालाबों और जलीय जीवन के लिए अभिशाप बन रही है? उत्तर है—परंपरा गलत नहीं है, बल्कि उस परंपरा को निभाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आधुनिक सामग्री हानिकारक हो चुकी है।

प्राचीन काल में क्यों पूरी तरह सुरक्षित था मूर्ति विसर्जन?
यदि हम अपने पूर्वजों की परंपरा और इतिहास का अवलोकन करें, तो पाएंगे कि उस समय विसर्जन की प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक और प्राकृतिक संतुलन पर आधारित थी:

शुद्ध मिट्टी का उपयोग: पूर्व में मूर्तियां गंगा-यमुना या स्थानीय तालाबों की शुद्ध मिट्टी (चिकनी मिट्टी) से गढ़ी जाती थीं। मिट्टी से बनी मूर्ति जैसे ही जल में प्रवेश करती थी, कुछ ही घंटों में घुल-मिलकर पुनः प्रकृति का हिस्सा बन जाती थी।

तांबा और पीतल का महत्व: कई बार तांबे, कांसा या पीतल जैसी धातुओं की प्रतिमाओं का विसर्जन होता था। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों प्रमाणित करते हैं कि तांबा और पीतल पानी को शुद्ध करने वाले प्राकृतिक तत्व हैं, जिनसे जलस्रोतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता था।

प्राकृतिक रंग: उस दौर में रंगों के लिए हल्दी, गेरू, फूलों के अर्क और प्राकृतिक गोंद का प्रयोग होता था, जो पानी में घुलकर किसी प्रकार की विषाक्तता (Toxicity) नहीं फैलाते थे।

आज की हकीकत: रेज़िन, प्लास्टिक और केमिकल रंगों का जानलेवा जहर
आधुनिक समय में लागत घटाने, मूर्तियों को अधिक चमकदार और टिकाऊ बनाने की होड़ में बाजार ने प्राकृतिक तत्वों को जहरीले रसायनों से बदल दिया है:

रेज़िन और प्लास्टिक का उपयोग: वर्तमान में बाजार में बिकने वाली अधिकांश छोटी-बड़ी मूर्तियां रेज़िन और प्लास्टिक मोल्ड्स से बनाई जा रही हैं। ये सामग्रियां 'नॉन-बायोडिग्रेडेबल' (गैर-अपघटनीय) होती हैं, जो सैकड़ों सालों तक पानी में गलती नहीं हैं।

पीओपी (POP) और भारी धातुएं: प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियां पानी में भारी गाद बनाती हैं। साथ ही, इन पर इस्तेमाल किए जाने वाले पेंट में लेड (सीसा), कैडमियम, क्रोमियम और मरकरी (पारा) जैसे बेहद जहरीले रसायन होते हैं।

जलीय जीवों पर असर: पानी में घुलने वाले ये घातक केमिकल ऑक्सीजन के स्तर (Dissolved Oxygen) को घटा देते हैं, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों का दम घुट जाता है और पूरा इकोसिस्टम नष्ट हो जाता है। बाद में यही दूषित पानी भूजल और पेयजल आपूर्ति में मिलकर मानव शरीर में कैंसर और त्वचा रोगों जैसी गंभीर बीमारियां पैदा करता है।

परंपरा का सम्मान और पर्यावरण की रक्षा: कैसे साधें संतुलन?
इसका समाधान परंपराओं को त्यागना नहीं, बल्कि समय के साथ परंपराओं में विवेकपूर्ण सुधार लाना है:

प्योर मिट्टी की मूर्तियों का संकल्प: हमें केवल शुद्ध मिट्टी (जैसे शाडू माटी) से बनी मूर्तियों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

होम विसर्जन (Home Visarjan): मिट्टी की मूर्तियों का विसर्जन घर के आंगन में या गमले में पानी डालकर किया जा सकता है। घुलने के बाद उस पवित्र मिट्टी में कोई पौधा लगाया जा सकता है, जिससे भगवान का स्वरूप एक नए जीवन (पेड़) के रूप में हमारे घर में ही विद्यमान रहे।

धातु की मूर्तियों का पुनः उपयोग: पीतल या तांबे की मूर्तियों का विसर्जन करने के बजाय हर वर्ष प्रतीकात्मक रूप से उनका जल-अभिषेक कर उन्हें मंदिर में पुनः स्थापित किया जा सकता है।

रेज़िन और प्लास्टिक का पूर्ण बहिष्कार: धार्मिक उत्सवों पर बाजार से प्लास्टिक या सिंथेटिक रेज़िन से बनी मूर्तियां खरीदने से स्पष्ट रूप से बचना चाहिए।

निष्कर्ष: आस्था वही, जो प्रकृति को जीवन दे
सनातन धर्म का शाश्वत संदेश है—"ईशा वास्यमिदं सर्वम्" यानी सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है। जिस जल को हम 'वरुण देव' मानकर पूजते हैं, उसी जल को भगवान के नाम पर प्रदूषित करना किसी भी दृष्टि से धार्मिक नहीं हो सकता।

आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दिखावे और कृत्रिमता की दौड़ से बाहर निकलकर अपनी जड़ों की ओर लौटें और अपनी प्राचीन, शुद्ध और पर्यावरण-हितैषी परंपराओं को अपनाकर प्रकृति और भावी पीढ़ियों के जीवन की रक्षा करें।

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