बारिश होने से ठीक 7 दिन पहले टपकने लगती है इस मंदिर की छत; कानपुर का जगन्नाथ मंदिर

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित भगवान जगन्नाथ का ऐतिहासिक मंदिर अपनी अनूठी और रहस्यमयी खगोलीय विशेषता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मंदिर को स्थानीय लोग 'मौसम मंदिर' या 'वाटरप्रूफ प्रिडिक्टर' के नाम से भी जानते हैं। जानिए कानपुर के बेहटा बुजुर्ग स्थित इस अनोखे जगन्नाथ मंदिर के इतिहास, वास्तुकला और वर्षा की भविष्यवाणी से जुड़े अद्भुत रहस्य की पूरी रिपोर्ट।

Sep 13, 2026 - 11:46
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बारिश होने से ठीक 7 दिन पहले टपकने लगती है इस मंदिर की छत; कानपुर का जगन्नाथ मंदिर

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर के बेहटा गांव में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में सुनकर शायद आपको भी यकीन करना मुश्किल हो जाए। कहा जाता है कि बारिश आने से करीब सात दिन पहले ही इस मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं। खास बात यह है कि उस समय आसपास बारिश का कोई नामोनिशान नहीं होता। यही वजह है कि सदियों से यह मंदिर लोगों के लिए आस्था के साथ-साथ रहस्य का भी केंद्र बना हुआ है।

यह मंदिर भगवान जगन्नाथ को समर्पित है और कानपुर जिले के भीतरगांव ब्लॉक मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर बेहटा गांव में स्थित है। स्थानीय लोगों के बीच मान्यता है कि जैसे ही बारिश का समय नजदीक आता है, मंदिर की छत के अंदर से पानी की छोटी-छोटी बूंदें दिखाई देने लगती हैं। बूंदों का टपकना लोगों के लिए आने वाली बारिश का संकेत माना जाता है।

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? क्या मंदिर की बनावट में कोई ऐसी खासियत है, जो मौसम में होने वाले बदलाव को पहले ही महसूस कर लेती है? या फिर इसके पीछे कोई प्राकृतिक प्रक्रिया है? इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश कई बार की गई, लेकिन आज तक इस रहस्य पर पूरी तरह से पर्दा नहीं उठ पाया है।

पुरातत्व विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने भी मंदिर से जुड़ी कई जांच और सर्वे किए हैं। इसके बावजूद मंदिर के निर्माण का सही समय और छत से बारिश से पहले पानी टपकने की घटना का सटीक कारण स्पष्ट नहीं हो सका। इतना जरूर माना जाता है कि मंदिर का आखिरी बड़ा जीर्णोद्धार 11वीं सदी के आसपास हुआ था।

इसके अलावा, कानपुर नगर के भीतरगांव में भारत का सबसे पुराना ईंटों से बना मंदिर मौजूद है, जो गुप्त काल का है। 5वीं-6वीं सदी के आसपास बना यह शानदार मंदिर अपने टेराकोटा पैनल और ईंटों की बारीक कारीगरी के लिए जाना जाता है।

भीतरगांव का प्राचीन ईंटों वाला मंदिर सिर्फ एक स्मारक ही नहीं, बल्कि भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास का एक अहम अध्याय भी है।

इनपुट : आईएएनएस

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