गोक्षुरा और चंद्रशूरा के सुरक्षित इस्तेमाल पर जोर, आयुष मंत्रालय ने किया एक्सपर्ट कमेटी का गठन

Oct 07, 2026 - 11:17
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गोक्षुरा और चंद्रशूरा के सुरक्षित इस्तेमाल पर जोर, आयुष मंत्रालय ने किया एक्सपर्ट कमेटी का गठन
Emphasis on the safe use of Gokshura and Chandrashura

नई दिल्ली । भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में औषधीय पौधों का महत्व सदियों से रहा है। आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी जैसी प्रणालियों में इन पौधों का इस्तेमाल स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए किया जाता है। ऐसे ही दो महत्वपूर्ण पौधे हैं गोक्षुरा और चंद्रशूरा। 

चंद्रशूरा और गोक्षुरा: पारंपरिक जड़ी-बूटियों का परिचय और महत्व

चंद्रशूरा को लेपिडियम सैटिवम के नाम से जाना जाता है। ये अपने पोषण और सेहत से भरपूर गुणों के लिए प्रसिद्ध है। आयुर्वेद में इसे पाचन सुधारने, शरीर को बल देने और समग्र ऊर्जा बढ़ाने वाली औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह एक सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाला पौष्टिक पौधा है।दूसरी ओर गोक्षुरा, जिसे ट्रिबुलस टेरेस्ट्रिस भी कहा जाता है, पारंपरिक चिकित्सा में एक खास स्थान रखता है।

इसके इस्तेमाल का इतिहास बहुत पुराना है और पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में इसके प्रति लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ी है। इसी वजह से वैज्ञानिक और शोध समुदाय भी अब इसके पारंपरिक उपयोगों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर समझने की कोशिश कर रहा है।

आयुष मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है

आज जब दुनियाभर में हर्बल और आयुर्वेदिक उत्पादों का चलन बढ़ रहा है, तो इनकी गुणवत्ता, प्रभाव और सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं। उपभोक्ताओं के भरोसे और सुरक्षित इस्तेमाल के लिए जरूरी है कि इन पौधों पर ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए आयुष मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है।मंत्रालय ने गोक्षुरा और चंद्रशूरा जैसे दो महत्वपूर्ण औषधीय पौधों की सुरक्षा प्रोफाइल पर अब ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

इनसे जुड़ी नई रेगुलेटरी चिंताओं को देखते हुए आयुष मंत्रालय ने एक अहम कदम उठाया है। मंत्रालय ने अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक मल्टीडिसीप्लिनरी एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है।

आयुष मंत्रालय ने किया एक्सपर्ट कमेटी का गठन

यह कमेटी सबूतों पर आधारित तकनीकी रिपोर्ट यानी डोजियर तैयार करेगी। इन रिपोर्टों का मुख्य उद्देश्य इन औषधीय पौधों के बारे में वैज्ञानिक समझ को मजबूत करना है। इसके साथ ही यह पता लगाना है कि अभी किन क्षेत्रों में जानकारी की कमी है और भविष्य में किस तरह के शोध की जरूरत है।मंत्रालय का मानना है कि इस तरह की तकनीकी रिपोर्ट्स से रेगुलेटरी संस्थाओं को सही और वैज्ञानिक फैसले लेने में मदद मिलेगी। इससे न केवल इन पौधों के सुरक्षित इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने में भी सहायता मिलेगी।

इनपुट : आईएएनएस

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