डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौते को दिया अंतिम रूप; बनाए जाएंगे 2 नए अमेरिकी सैन्य बेस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक के इतर डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ ऐतिहासिक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर इसे अंतिम रूप दे दिया है। इस ऐतिहासिक रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को रणनीतिक रूप से अहम आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति का विस्तार करने, दो नए सैन्य ठिकाने स्थापित करने और 'गोल्डन डोम' मिसाइल रक्षा प्रणाली तैनात करने का अधिकार मिला है। जानिए इस रक्षा समझौते के मुख्य बिंदु, 1951 की ऐतिहासिक संधि में संशोधन और वैश्विक भू-राजनीति पर इसके असर की पूरी रिपोर्ट।

Sep 23, 2026 - 11:30
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डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौते को दिया अंतिम रूप; बनाए जाएंगे 2 नए अमेरिकी सैन्य बेस

न्यूयॉर्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क और उसके स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड के साथ महीनों से जारी कूटनीतिक गतिरोध को समाप्त करते हुए एक व्यापक और ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा व सुरक्षा समझौते (Arctic Security Pact) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के वार्षिक अधिवेशन के इतर आयोजित एक विशेष समारोह में इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया।

इस समझौते पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने औपचारिक हस्ताक्षर किए।

समझौते की तस्वीर: कूटनीतिक गतिरोध का समाधान

ग्रीनलैंड रक्षा समझौते पर ट्रंप के हस्ताक्षर, AI generated

समझौते के तहत अमेरिका को क्या-क्या मिला?

यह समझौता शीत युद्ध के बाद से ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य बुनियादी ढांचे का सबसे बड़ा विस्तार माना जा रहा है:

  • 'गोल्डन डोम' मिसाइल रक्षा प्रणाली: समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी प्रस्तावित बैलिस्टिक मिसाइल शील्ड 'गोल्डन डोम' (Golden Dome Defense System) स्थापित करने की अनुमति मिली है, जो उत्तरी अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा में ढाल का काम करेगी।

  • दो नए सैन्य ठिकाने: अमेरिका उत्तर-पश्चिम ग्रीनलैंड में स्थित अपने मौजूदा पिटुफिक स्पेस बेस (Pituffik Space Base) के अलावा दक्षिण में 'नरसासुआक' (Narsarsuaq) और पूर्व में 'मेस्टर्सविग' (Mestersvig) में दो नए रक्षा क्षेत्र/सैन्य अड्डे विकसित करेगा।

  • प्रतिद्वंद्वी देशों के निवेश व सैन्य बेस पर पाबंदी: समझौते के अनुसार, अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्पष्ट लिखित अनुमति के बिना नाटो या यूरोपीय संघ के बाहर का कोई भी देश (विशेषकर चीन और रूस) ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा नहीं बना सकेगा और न ही महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे व खनिजों में संवेदनशील निवेश कर सकेगा।

  • स्थायी प्रकृति: इस समझौते की कोई अंतिम तिथि (Expiry Date) नहीं है और यह भविष्य में ग्रीनलैंड के पूर्ण स्वतंत्र होने की स्थिति में भी प्रभावी रहेगा।

मुख्य बिंदुओं का तुलनात्मक विवरण

प्रमुख आयाम समझौते के प्रमुख प्रावधान
विधिक आधार वर्ष 1951 की ऐतिहासिक अमेरिका-डेनमार्क रक्षा संधि का आधुनिकीकरण और संशोधन।
संप्रभुता का मुद्दा ग्रीनलैंड को खरीदने/कब्जे की मांग खत्म; डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय का औपचारिक सम्मान।
सैन्य पहुंच पूरे द्वीप और उसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी जहाजों व विमानों को व्यापक और निर्बाध आवाजाही की अनुमति।
अनुसमर्थन (Ratification) समझौते को कानून बनने से पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों द्वारा पारित होना होगा।

ट्रंप का दावा बनाम यूरोपीय सहयोगियों का रुख

समझौते पर हस्ताक्षर के बाद नेताओं ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं:

  • डोनाल्ड ट्रंप का बयान: राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "यह समझौता हमें ग्रीनलैंड की सुरक्षा और सभी सैन्य जरूरतों पर स्थायी नियंत्रण देता है। अब कोई भी प्रतिद्वंद्वी हमारी इजाजत के बिना इस द्वीप की ओर आंख उठाकर नहीं देख सकता। यह समझौता यूरोप, अमेरिका और ग्रीनलैंड सभी के लिए अविश्वसनीय जीत है।"

  • डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन: फ्रेडरिकसन ने इसे 1951 की संधि से 'बड़ा और बेहतर' बताते हुए कहा कि यह समझौता नाटो की सामूहिक रक्षा को मजबूत करता है और ग्रीनलैंड के लोगों के अधिकारों को पूरी सुरक्षा देता है।

  • ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन: उन्होंने कहा कि इस समझौते के केंद्र में ग्रीनलैंड की जनता, उनके अधिकार और उनका आर्थिक विकास है, साथ ही आर्कटिक में नाटो की भूमिका को मजबूती मिलेगी।

नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे ने भी इस समझौते का स्वागत किया और कहा कि यह कदम उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक क्षेत्र में साझा प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) और स्थिरता को सुदृढ़ करेगा।

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