Independence Day Special: भारत का इकलौता राज्य जो कभी अंग्रेजों का गुलाम नहीं रहा; जानिए कैसे महज 36 घंटे के सैन्य ऑपरेशन में हुआ था आजाद
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से आजाद होकर जश्न मना रहा था, तब भारत का एक खूबसूरत हिस्सा ऐसा भी था जो तब भी विदेशी कब्जे में था। वह राज्य 'गोवा' था, जिस पर अंग्रेजों ने नहीं बल्कि पुर्तगालियों ने करीब 451 साल तक राज किया। देश की आजादी के 14 साल बाद 1961 में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' (Operation Vijay) शुरू किया और महज 36 घंटे के भीतर गोवा को आजाद कराकर तिरंगा फहरा दिया। जानिए गोवा मुक्ति की यह ऐतिहासिक और साहसिक गाथा।
नई दिल्ली: हर साल 15 अगस्त को पूरा देश स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) के राष्ट्रीय पर्व पर उन अमर बलिदानियों को याद करता है, जिन्होंने हमें ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति दिलाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत का एक ऐसा राज्य भी है, जो कभी भी अंग्रेजों (Britishers) का गुलाम नहीं रहा?
यह राज्य है गोवा (Goa)। जब 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर पर पहली बार तिरंगा फहराया गया, तब भी गोवा भारत का हिस्सा नहीं था और वहां विदेशी शासन जारी था। गोवा पर अंग्रेजों का नहीं, बल्कि पुर्तगालियों (Portuguese) का 450 से अधिक वर्षों तक शासन रहा। भारत को आजादी मिलने के 14 साल बाद, भारतीय सेना ने एक ऐसा सैन्य अभियान चलाया जिसने महज 36 घंटे के भीतर इतिहास बदल दिया।
अंग्रेजों से पहले आए और अंग्रेजों के बाद गए पुर्तगाली
पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने 1510 में बीजापुर के सुल्तान युसुफ आदिल शाह को हराकर गोवा पर कब्जा किया था। यानी जब भारत में मुगलों और अंग्रेजों का नामोनिशान नहीं था, तब से पुर्तगाली गोवा पर काबिज थे।
1947 में जब ब्रिटिश भारत छोड़कर चले गए, तब भारत सरकार ने पुर्तगाल के तानाशाह एंटोनियो डी ओलिवेरा सालाजार से कूटनीतिक बातचीत के जरिए गोवा, दमन और दीव को भारत को सौंपने की अपील की। लेकिन पुर्तगाल ने गोवा को भारत का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया और इसे पुर्तगाल का एक 'विदेशी प्रांत' (Overseas Province) करार दिया।
डॉ. राम मनोहर लोहिया और गोवा मुक्ति संग्राम
गोवा को आजाद कराने के लिए स्थानीय नागरिकों और स्वतंत्रता सेनानियों ने कई वर्षों तक कड़ा संघर्ष किया:
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1946 की शुरुआत: समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 18 जून 1946 को मडगांव में पुर्तगाली दमन के खिलाफ नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, जिसने स्थानीय लोगों में आजादी की अलख जगाई।
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सत्याग्रह और शहादत: भारत भर से सत्याग्रही गोवा पहुंचे, जिन पर पुर्तगाली पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। कई स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और सैकड़ों को जेलों में अमानवीय यातनाएं दी गईं।
'ऑपरेशन विजय': जब 36 घंटे में सेना ने झुकाया पुर्तगाल का झंडा
जब कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद हो गए और पुर्तगाली सैनिकों ने भारतीय व्यापारिक जहाजों और मछुआरों पर गोलियां चलाईं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन ने सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया।
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कार्रवाई की शुरुआत: 18 दिसंबर 1961 की सुबह भारतीय सेना, नौसेना (Indian Navy) और वायुसेना (Indian Air Force) ने संयुक्त रूप से 'ऑपरेशन विजय' (Operation Vijay) शुरू किया।
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तीनों सेनाओं का त्रिशूल प्रहार:
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भारतीय सेना: मेजर जनरल के. पी. कैंडेथ के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने तीन दिशाओं से गोवा में प्रवेश किया।
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भारतीय वायुसेना: वायुसेना के कैनबरा और हंटर विमानों ने डाबोलिम हवाई पट्टी और बम्बोलिम के वायरलेस स्टेशन को नष्ट कर पुर्तगाल का संपर्क काट दिया।
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भारतीय नौसेना: भारतीय युद्धपोत आईएनएस बेतवा और आईएनएस राजपूत ने मोरमुगाओ बंदरगाह पर पुर्तगाली युद्धपोत 'अल्फोंसो डी अल्बुकर्क' को पूरी तरह तबाह कर दिया।
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ऐतिहासिक आत्मसमर्पण: भारतीय सेना के अदम्य साहस और तेजी के आगे पुर्तगाली सेना टिक नहीं सकी। 36 घंटे के भीतर 19 दिसंबर 1961 की शाम को पुर्तगाल के अंतिम गवर्नर-जनरल मैनुअल एंटोनियो वासालो ई सिल्वा ने बिना शर्त आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
तिरंगा लहराया और पूरा हुआ भारत का नक्शा
19 दिसंबर 1961 को गोवा से 451 साल पुराने पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन का हमेशा के लिए अंत हो गया और गोवा की धरती पर भारत का तिरंगा शान से फहराया गया। इसी कारण हर साल 19 दिसंबर को 'गोवा मुक्ति दिवस' (Goa Liberation Day) के रूप में मनाया जाता है।
यह ऐतिहासिक दिन इस बात की याद दिलाता है कि भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हमारे सशस्त्र बलों और स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान कितना अतुलनीय और गौरवशाली रहा है।
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