अंग्रेजों के जमाने का मेरठ- 3
- चार फीट आठ इंच की बेगम जिसका कद मेरठ के इतिहास में बहुत ऊंचा है
- दिल्ली के चावड़ी बाजार की तवायफ से लेकर मेरठ-सरधना की शासक तक की यात्रा अनेक मोड़ से होकर गुजरी

मेरठ का शायद ही कोई शख्स ऐसा होगा जिसने बेगम समरू के बारे में नहीं सुना होगा। लेकिन उनके बारे में अनेक दास्तां अनसुनी है। दरअसल बेगम समरू एक ऐसा किरदार है जिसका जीवन चरित्र ऐसा है कि उसपर बॉलीवुड की रोचक फिल्म बन सकती है। बात करते हैं बेगम समरू के बचपन की। मेरठ के पास कुताना कस्बे में एक मुगल जमींदार लतीफ अली खान उर्फ असद खान रहा करते थे। 1757 में उनको एक बेटी हुई तो उन्होंने बड़े प्यार से उसका नाम फरजाना उर्फ जेबुन्निसा रखा। फरजाना के हंसी-खुशी के साथ गुजरते बचपन को किसी की नजर लग गई। उनके पिता लतीफ खान को मौत ने अचानक लील लिया। लतीफ खान की एक और बीवी व उसका बेटा था।
सौतेली मां और उसके बेटे ने फरजाना और उसकी मां को घर से निकाल दिया। वक्त के थपेड़े कुताना से बहाकर दिल्ली के चावड़ी बाजार के एक कोठे तक ले गए। चूंकि फरजाना बेहद जहीन और खूबसूरत थी, लिहाजा हर किसी का ध्यान उसकी ओर बरबस ही चला जाता। अलबत्ता, उसका कद बहुत छोटा था, चार फुट आठ इंच। उनके कद की नाप कभी उसका चित्र बनाने वाले चित्रकार ने नापा था। उसके कंठ में बला की मिठास थी और पैरों में गजब की फुर्ती। वह नाचती तो ऐसा लगता कोई परी रक्स कर रही हो। उन दिनों तयावफों के कोठों पर फिरंगी और दूसरे विदेशी फौजी बहुत आया करते थे।
एक दिन फरजाना सारंगी के सुरों, तबले की थाप के दरम्यान फिरकी की तरह नाच रही थी, तभी उसके कोठे पर एक शख्स नमूदार हुआ। गठा कद, रोबीली मूंछें, शानदार कपड़े और चाल में अजब सा बांकपन। कई तवायफों के कोठों पर जा चुका था, लेकिन कोई उसे लुभा नहीं पाया था। लेकिन जैसे ही वह फरजाना के कोठे पर दाखिल हुआ और उसने उसे नाचते देखा तो उसकी नजरें एकदम से ठिठक गईं। ऐसा दिलकश हुस्न, ऐसा जादुई रक्स उसने कभी नहीं देखा था। वह देखता ही रहा और फरजाना उसके दिल में पैबस्त होती गई। फरजाना की उम्र उस वक्त मजह 14 साल की थी। फरजाना पर पहली ही नजर में दिल लुटाने वाला शख्स था एक जर्मन-आस्ट्रियाई भाड़े का फौजी वाल्टर रेनहार्ड सेमब्रे। प्यार से उसके दोस्त उसे समरू कहते थे। समरू ने तत्काल कोठे की मालकिन से बात की। उसे मनमानी रकम देकर फरजाना को मुक्त करा लिया। वाल्टर उर्फ समरू ने ईसाई रीति-रिवाज से फरजाना से शादी कर ली। इस तरह फरजाना बेगम समरू बन गई।
मराठों से समझौते के तहत मेरठ और आसपास का इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में आ गया। उधर, एक मामूली फौजी से तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वाल्टर रेनहार्ड ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर सरधना, मेरठ और आसपास के इलाकों का प्रशासक बन बैठा। बहरहाल हिंदुस्तानी आबो-हवा उसके बहुत मुफीद नहीं थी। 1778 ईस्वी में वाल्टर रेनहार्ड सेमब्रे की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी चहेती बेगम समरू ने शासन की बागडोर अपने हाथों में थाम ली। अपने शासक व फौजी पति से बेगम समरू ने घुड़सवारी, तलवारबाजी और हथियार चलाने की कला भी सीख ली थी। पति की मौत के बाद 4000 सिपाहियों की अगुवाई करती बेगम समरू ने अपनी धाक चारो ओर जमा ली। मेरठ ही नहीं, पूरे अवध व संयुक्त प्रांत ही नहीं, मराठवाड़ा तक बेगम समरू की चर्चा होने लगी।
जरा बेगम समरू की सख्सियत के बारे में कुछ और जान लें। खड़ी बोली (हिंदी), उर्दू, फारसी तो वह धड़ल्ले से बोलती ही थीं, अंग्रेजी और फ्रेंच में भी बातचीत करके विदेशियों को चमत्कृत कर देती थीं। बेगम समरू बनने के बाद कभी भी उन्होंने पर्दा नहीं किया। वह खुले मुंह पुरुष दरबारियों और अफसरों से मिलतीं। सबके साथ खाना खा लेतीं और हुक्का पी लेतीं। रेशमी कुर्ती, चूड़ीदार पाजामा और पश्मीने की शाल उनकी पोशाक थी। रोचक बात यह थी कि बेगम समरू सिर पर हमेशा पुरुषों की तरह मर्दाना पगड़ी पहनती थीं। जो चीज लोगों का सबसे ज्यादा ध्यान खींचती वह थी उनका अनूठा आत्मविश्वास। नाटे कद की आकर्षक लेकिन बेबाक, बिंदास और मुंहफट बेगम को देखकर पहली नजर में तो पुरुष हैरान हो जाते। उनकी घुड़सवारी और शस्त्रकला देखकर सभा दांतों तले अंगुली दबा लेते। बेगम समरू एक बेहतरीन प्रशासक भी थीं। उनके समय में मेरठ का राजस्व करोड़ों रुपये का था।

शाह आलम द्वितीय की तीन बार जान बचाई थी बेगम समरू ने
मुगल सल्तनत के बादशाह शाह आलम द्वितीय से बेगम समरू के बहुत अच्छे संबंध थे। लेकिन दिल्ली में उनकी ताकत कमजोर पड़ रही थी। बाहरी आक्रमणकारियों की नजर लाल किले पर थी। 1787 में रोहिल्ला अफगान सरदार गुलाम कादिर ने लाल किले को अपनी फौज के साथ घेर लिया। शाह आलम ने बेगम समरू से मदद मांगी। बेगम समरू के पास यूरोपियनों द्वारा प्रशिक्षित फौज और तोपखाना था। बेगम समरू मेरठ से फौरन निकलकर अपनी फौज के साथ दिल्ली पहुंच गईं। अफगान सरदार ने बेगम समरू को लालच देकर अपनी ओर मिलाना चाहा। गुलाम कादिर ने बेगम समरू को अपने साथ निकाह और दिल्ली का आधा साम्राज्य देने का वादा भी किया। लेकिन समरू ने बहादुरी के साथ उसका मुकाबला किया और उसकी फौजों को दिल्ली से खदेड़ दिया। शाह आलम ने खुश होकर बेगम समरू को जेबुन्निसा अर्थात महिलाओं का आभूषण) का खिताब दिया।
दूसरी बार 1788 में नजफ कुली नाम के बगावती सरदार ने भी लाल किले की घेराबंदी कर डाली। बादशाह की हार तय लग रही थी। लेकिन बेगम समरू ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। पालकी में सवार होकर वह अपने फौजियों के साथ युद्ध के मैदान में उतरीं। दुश्मन पर ऐसा धावा बोला कि उसके पांव उखड़ गए। शाह आलम कृतज्ञता के भाव से भर उठे। बूढ़े बादशाह ने बेगम समरू को फरजंद-ए-अजीजा अर्थात सबसे प्रिय पुत्री के खिताब से नवाजा। यही नहीं, शाह आलम ने बेगम समरू को बादशाहपुर-झारसा की जागीर भी बतौर इनाम दे दी। यह इलाका मौजूदा समय में गुरुग्राम (गुड़गांव) के आसपास है।
तीसरी बार बेगम समरू ने सिख सरदार बघेल सिंह से शाह आलम का समझौता उस समय करवाया था जब 70 हजार की ताकतवर फौज लेकर दिल्ली की ओर कूच कर रहा था।
सरधना के ऐतिहासिक चर्च से लेकर भगीरथ पैलेस तक अनेक भवन की निर्माता रहीं बेगम समरू
मुगल बादशाह शाहजहां को लाल किला और ताजमहल जैसे उच्चकोटि के भवनों के निर्माता के तौर पर याद किया जाता है। इस लिहाज सेअगर बेगम समरू को महिला शाहजहां कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। जिन्होंने सरधना का ऐतिहासिक चर्च देखा है, वह इसकी भव्यता और निर्माण शैली से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इसमें आज भी क्रिसमस और दूसरे अवसरों पर हजारों लोग जुटते हैं। इसके अलावा बेगम समरू ने चांदनी चौक में एक हवेली का निर्माण कराया था, जिसे आज हम सब भगीरथ पैलेस के नाम से जानते हैं। इसे एशिया की बिजली वायर, केबिल, कल-पुर्जों और इलेक्ट्रानिक की सबसे बड़ी मंडी का दर्जा हासिल है।
सरधना में बनवाए गए उनके मुख्य महल में वर्तमान में सेंट चार्ल्स इंटर कॉलेज का संचालन होता है। इसके अलावा गुरुग्राम में भी उन्होंने एक महल बनवाया था। बेगम समरू के अपनी कोई संतान नहीं थी। अलबत्ता, वाल्टर की दूसरी पत्नी से एक पुत्र ने जन्म लिया था। वह बेगम समरू को बेहद प्रिय था। शायद इसी वजह से उसका नाम जफरयाब खान रखा गया था। उसकी परवरिश बेगम समरू ने ही की थी। 27 जनवरी, 1836 को 83 साल की उम्र में बेगम समरू ने आखिरी सांस ली। उन्हें सरधना के चर्च में ही दफनाया गया। आज भी उनकी कब्र पर लोग खिराज-ए-अकीदत पेश करते हैं।
- ( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं )
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