अंग्रेजों के जमाने का मेरठ- 2
- क्या आप जानते हैं 1915 में भी मेरठ से एक सशस्त्र क्रांति की पटकथा लिखी गई थी.
- गोपाल कृष्ण गोखले, रासबिहारी बोस भी आए थे मेरठ.
- 10 शक्तिशाली बमों के साथ पकड़े गए थे रास बिहारी बोस के सहयोगी.

मेरठ को यूं ही क्रांतिधरा नहीं कहा जाता। 1857 की क्रांति के बारे में तो सभी जानते हैं जिसकी अलख मेरठ छावनी में अमर शहीद मंगल पांडे ने जगाई थी। अंग्रेजी फौज और शासन के खिलाफ एक और बगावती सुर 1915 में फूटा था। दरअसल, क्रांतिकारी रास बिहारी बोस दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर 27 दिसंबर, 1912 को बम फेंकने की कोशिश में गिरफ्तार किए गए थे। लेकिन, अंग्रेजों को वह चकमा देकर भागने में सफल रहे थे। बताया जाता है कि रास बिहारी बोस ने अपनी फरारी के दौरान कई बार मेरठ का गुप्त दौरा किया था।
दरअसल, वह यहां स्थित छावनी का भेद लेकर एक बड़ी बगावत की इबारत लिखना चाहते थे। इसके लिए वह मेरठ में छावनी के पास बड़े पैमाने पर वह विस्फोटक, बम इत्यादि जुटा रहे थे। अंग्रेजी शासनकाल में ऐन छावनी के इर्द-गिर्द सशस्त्र बगावत की तैयारी करना कोई हंसीखेल नहीं था। लेकिन आजादी के मतवालों को खतरों की परवाह नहीं थी। इस काम में उनके सबसे प्रमुख सहयोगी व विश्वासपात्र विष्णु पिंगले थे। फरवरी 1915 को हथियारबंद बगावत की तैयारी हो रही थी। लेकिन भारत का इतिहास जहां देशभक्तों की शौर्यगाथाओं से भरा पड़ा है वहीं इसे काले अक्षरों में विश्वासघातियों ने भी हस्ताक्षर किए हैं। किसी विश्वासघाती ने इस प्रस्तावित बगावत और विष्णु पिंगले की रिहाइश की जानकारी अंग्रेजी खुफिया विभाग तक पहुंचा दी। फिर क्या था। विष्णु पिंगले पकड़े गए।
कहा जाता है कि उनके पास 10 बड़े बम बरामद किए गए थे। बमों की ताकत को देखते हुए तत्कालीन विशेषज्ञों ने माना था कि ये बम एक पूरी फौजी रेजीमेंट को तबाह करने के लिए पर्याप्त थे। बहरहाल, इस प्रस्तावित हथियारबंद बगावत की पटकथा हकीकत का जामा पहनने से पहले ही दम तोड़ गई। ये तो थी मेरठ से एक और बगावत की तैयारी की दास्तां। लेकिन इससे जरा सा पीछे चलें तो भारत में गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने से पहले ही मेरठ के लोगों ने उसकी तैयारी कर ली थी।
1906 में मेरठ में शुरू हुआ था एक स्वदेशी आंदोलन, गोखले का दौरा
1906 में कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में अंग्रेजों से पराधीनता के खिलाफ नए सिरे से जंग छेड़ने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसी के साथ मेरठ में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने की मुहिम शुरू हो गई थी। इस बाद को याद रखना होगा कि इस वक्त गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। भारत के स्वाधीनता आंदोलन में तो वे 1915 के बाद कूदे थे। इसके बाद उन्होंने स्वदेशी, सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अखिलभारतीय स्तर पर शुरुआत की थी। लेकिन, इससे दस साल पहले ही क्रांति धरा मेरठ ने स्वदेशी आंदोलन का बिगुल बजा दिया था। 1907 में गांधी जी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले ने मेरठ का दौरा किया था। क्यां हिंदू, क्या मुस्लिम, मेरठ के सभी नागरिकों ने गोखले का जबरदस्त स्वागत किया था। उन्हें पूरे मेरठ शहर और छावनी के इलाके में ऐसी गाड़ी में घुमाया गया जिसे मेरठ के सभ्रांत लोग अपने हाथों से खींच रहे थे। 1909 में मेरठ में पचास सदस्यों के साथ मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई वाली मुस्लिम लीग की शाखा भी खोली गई थी। इसका भी शुरुआती मकसद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग करना था। इस तरह से 1857 के बाद भी मेरठ क्रांतिकारियों का गढ़ बना रहा।
- अगले अंक में अंग्रेजों के जमाने के किसी और विषय पर चर्चा.
( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं )
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