अंग्रेजों के जमाने का मेरठ- 4
- देवबंद शहर में कभी हिंदू-मुस्लिम की आबादी थी लगभग बराबर, अब हिंदू यहां अल्पसंख्यक
- कभी देवीबन अर्थात देवी मां के जंगल के रूप में थी इसकी पहचान

ब्रितानिया हुकूमत के दिनों में मेरठ संभाग बहुत विस्तृत था। अलीगढ़ से लेकर देहरादून तक के इलाके मेरठ संभाग के ही अधीन थे। मौजूदा समय के जिले बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर भी इसमें शामिल थे। आज चर्चा मेरठ संभाग के एक कस्बे देवबंद की। आज के देवबंद को हम इस्लामी शिक्षा के एक बड़े केंद्र के तौर पर जानते हैं। आप हैरत में पड़ जाएंगे जब यह जानेंगे की देवबंद नाम दरअसल देवीबन से निकला है। अर्थात यहां देवी दुर्गा के एक स्वरूप का मंदिर था, जो दूर-दूर तक विख्यात था। सालाना यहां मेला लगता था।
अंग्रेज अफसरों ने अपने अभिलेखों में इस स्थान को पांडवों के वनवास से भी जोड़ा है। यहां एक किला भी मौजूद था, जिसके बारे में कहा जाता है कि सैयद सालार गाजी ने इसे ध्वस्त कर दिया था। मौजूदा समय में देवबंद शहर की आबादी लगभग डेढ़ लाख है। इसमें 71.6 फीसदी मुस्लिम हैं, जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 27.87 फीसदी है। 1901 में देवबंद की आबादी सिर्फ 20167 थी। इसमें से मुस्लिम जनसंख्या 11825 थी। बाकी लोग अर्थात लगभग 48 फीसदी हिंदू थे। कमाल देखिए धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के बाद भी यहां कालांतर में हिंदू अल्पसंख्यक होते चले गए।
देवबंद का मशहूर मदरसा दिल्ली के अजमेरी गेट कॉलेज की शाखा के तौर पर स्थापित की गई थी
ब्रिटिश कालीन अभिलेखों के मुताबिक, देवबंद का विख्यात मदरसा दिल्ली के अजमेरी गेट कॉलेज की शाखा के तौर पर 1876 में स्थापित किया गया था। रोचक बात यह है कि अजमेरी गेट कॉलेज अंग्रेजों के समय में ही बंद हो चुका था, लेकिन इसकी शाखा के तौर पर देवबंद मदरसा दिनों-दिन फलता-फूलता गया। शुरू से ही मुख्य रूप में यहां पर इस्लामिक दीनी तालीम दी जाती थी। ब्रिटिश सरकार ने इसकी शिक्षा अथवा प्रशासन में कभी दखल नहीं दिया। आज देवबंद के लोग 1857 की क्रांति में शिरकत की बड़ी लंबी-चौड़ी बातें करते हैं, लेकिन अंग्रेजों ने लिखा कि उस दौरान इस कस्बे में भी कुछ खुराफात हुई थी जिसे बड़े आराम से दबा दिया गया था। देवबंद में कभी अफगानिस्तान, बुखारा, समरकंद, मद्रास और बंगाल के छात्र पढ़ने के लिए आते थे।
देवबंद अंग्रेजों के जमाने में अनाज की बड़ी मंडी थी, कलकत्ता से आते थे व्यापारी
यमुना के किनारे स्थित होने की वजह से देवबंद और आसपास की जमीन बहुत उपजाऊ थी। इसका ज्यादातर हिस्सा सिंचित था। यही वजह है कि यहां अनाज की पैदावार बहुत होती थी। आलम यह था कि यहां की मंडी से अनाज खरीदने के लिए कलकत्ता से व्यापारी और उनके एजेंट डेरा डाले रहते थे। यही नहीं, उच्च गुणवत्ता की चीनी और तिलहन भी यहां से बाहर जाता था। अंग्रेजों के जमाने का देवबंद सूती कपड़ों व कंबल के निर्माण में भी बहुत आगे था। यहां से देश के दूसरे हिस्सों में ये वस्तुएं भेजी जाती थीं।
- ( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं )
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