अंग्रेजों के जमाने का मेरठ -1
- मौसम का जो रिकार्ड आजतक नहीं टूटा: 18 सितंबर, 1880 को मवाना में हुई थी 393.7 मिली मीटर बारिश.

अंग्रेजों के जमाने का मेरठ कैसा था, यह जानने की उत्सुकता सभी को रहती है। शुरुआत करते हैं मौसम से। मौसम तेजी से बदलने वाली चीज है। इस साल मेरठ में रिकार्डतोड़ बारिश की बात कही जा रही है। बारिश को वैज्ञानिक तरीके से नापने की शुरुआत अंग्रेजों ने ही की थी। इसके लिए पूरे जिले में 9 केंद्र बनाए गए थे।
गंगा-यमुना के दोआब के बीच बसे ऐतिहासिक शहर मेरठ पर इस बार इंद्र कुछ ज्यादा ही मेहरबान हैं। मेरठ में मानसून की अपेक्षाकृत कम बारिश होती है। उस पर से इस साल अलनीनो प्रभाव की वजह से मौसम वैज्ञानिकों ने सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई थी। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुमान को छकाते हुए मेघ न सिर्फ जमकर बरसे, बल्कि सारा रिकार्ड तोड़ दिया।
मौसम विज्ञान विभाग के 117 साल की तुलना करें तो इस साल 9 जुलाई को मेरठ की मवाना तहसील में 320 मिली मीटर बारिश हुई जिसे हाल की सबसे बड़ी बारिश बताया जा रहा है। जब से आधुनिक तरीके से मौसम के आंकड़े दर्ज किए जा रहे हैं, मवाना में ही 18 सितंबर, 1880 को इतिहास की सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी। 24 घंटों में इस दिन 393.7 मिली मीटर बारिश हुई थी। मेरठ जिला मुख्यालय में भी 9 जुलाई को 181.3 मिली मीटर बारिश दर्ज की गई जो इतिहास की अब तक की तीसरी सबसे ज्यादा बारिश बताई गई है।
मेरठ मुख्यालय में एक दिन में सबसे ज्यादा बारिश का रिकार्ड 20 जुलाई 1909 का है जब यहां एक दिन में 227.1 मिली मीटर बारिश दर्ज की गई थी। दूसरी सबसे ज्यादा बारिश का रिकार्ड 27 जुलाई 2018 को दर्ज किया गया था जब एक दिन में 226.2 बारिश दर्ज की गई थी।
ज्यादा बारिश के फायदे जरूर हैं, लेकिन बिना पर्यावरण के मुद्दे पर कुछ किए बगैर असामान्य बारिश चिंता और चिंतन दोनों का विषय है। पेड़ लगातार काटे जा रहे हैं। वाहनों का धुआं वायुमंडल में सुरसा के मुंह की तरह पसरता जा रहा है। इस साल अलनीनो के असर की भी बात कही जा रही थी। लेकिन मेरठ में सामान्य से ज्यादा बारिश हो रही है। मौसम की अबूझ पहेली से वैज्ञानिक भी हैरत में हैं। दरअसल मौसम गणित की तरह सीधा-सपाट विज्ञान नहीं है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) में वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे डॉ एके श्रीवास्तव बताते हैं कि दरअसल प्रकृति के पास एक अनोखी ताकत होती है जिसे हम विप्लवकारी या उथलपुथल कारी शक्ति कह सकते हैं। इसके तहत मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल सकता है। रेगिस्तान में बारिश, पहाड़ों पर गर्मी, मेरठ जैसे स्थान पर अप्रत्याशित बारिश इसी शक्ति के उदाहरण हैं। कई बार प्रकृति बिना मानव प्रयास के ही मौसम के असंतुलन को संतुलित या ठीक भी कर देती है। कभी वायुमंडल में मौजूद ओजोन परत में तेजी से एक छिद्र बढ़ता जा रहा था।
वायुमंडलीय प्रदूषण लगातार बढ़ते जाने के बाद भी ओजोन परत का छिद्र बढ़ने के बजाय सिकुड़ता जा रहा है। इसका अर्थ यही है कि कुदरत खुद को संतुलित करना जानती है। अन्यथा हम सभी जानते हैं कि ओजोन परत में छेद बढ़ते जाने का अर्थ था सूरज से धरती पर आने वाली घातक पराबैगनी किरणों की तीव्रता में तेजी। इससे पूरी मानव सभ्यता का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता था। प्रकृति की इसी शक्ति के कुछ सुखद परिणाम भी हाल में देखने को मिले हैं। उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों के भूजल स्तर में सुधार हुआ है और डार्क जोनों की संख्या में कमी आई है।
आम तौर पर लोग कह देते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ज्यादा गर्मी पड़ रही है। अगर हम मेरठ शहर में गर्मी का हाल जानें तो आंकड़े हमें चौंका सकते हैं। मेरठ के इतिहास का सबसे गर्म दिन 125 साल पहले 13 जून 1901 का था जब यहां का तापमान 46.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। 7 जून 1962 को भी मेरठ का तापमान 46.01 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। इसी तरह मेरठ का सबसे ठंडा दिन भी 121 साल पहले 31 जनवरी 1905 को दर्ज किया गया था, जब यहां का तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस था।
( फ्रीलांसर पत्रकार: रत्ना )
अंग्रेजों के जमाने के किसी और चीज की चर्चा --अगले अंक में
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