राष्ट्रमंडल का आर्थिक संकट और भारतीय खिलाड़ियों का जांबाज़ सफर
- राष्ट्रमंडल का आर्थिक संकट और भारतीय खिलाड़ियों का जांबाज़ सफर.

आकाश कुमार, शोधार्थी, सीसीएसयू मेरठ | वैश्विक खेल इतिहास में कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जो केवल खिलाड़ियों की प्रतिभा ही नहीं, बल्कि व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और देशों की सामूहिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा लेते हैं। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 ऐसा ही एक आयोजन है, जिसने पदकों की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ आर्थिक संकट और खेलों के बदलते स्वरूप की कहानी भी दुनिया के सामने रखी। यह कहानी ग्लासगो से नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य से शुरू होती है, जिसे मूल रूप से मेजबानी सौंपी गई थी। प्रारंभिक अनुमानित लागत 2.6 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर थी, लेकिन बढ़ती महंगाई और निर्माण लागत के कारण यह बढ़कर लगभग 7 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई। अंततः जुलाई 2023 में विक्टोरिया सरकार ने अस्पतालों, स्कूलों और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं पर असर पड़ने का हवाला देते हुए मेजबानी छोड़ दी।
राष्ट्रमंडल खेलों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया, लेकिन स्कॉटलैंड के ग्लासगो ने अंतिम समय में जिम्मेदारी संभाली। आर्थिक दबाव को देखते हुए आयोजकों ने 'लाइट एंड लीन' मॉडल अपनाया, जिसके तहत कोई नया स्टेडियम या खेल गांव नहीं बनाया गया और पहले से उपलब्ध चार प्रमुख खेल परिसरों में ही पूरे आयोजन को सीमित कर दिया गया। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर खेलों की सूची पर पड़ा। 2022 बर्मिंघम के 19 खेलों की जगह केवल 10 खेल रखे गए और कई प्रमुख स्पर्धाओं को बाहर कर दिया गया।
इनमें निशानेबाजी, कुश्ती, हॉकी, क्रिकेट जैसे खेल शामिल थे। इसके पीछे मुख्य कारण वित्तीय सीमाएं और आवश्यक खेल अवसंरचना की अनुपलब्धता थी। विशेष शूटिंग रेंज, कुश्ती की तकनीकी व्यवस्थाएं तथा टीम खेलों में खिलाड़ियों और सहयोगी स्टाफ पर आने वाला भारी खर्च आयोजकों के लिए संभव नहीं था। इस आर्थिक निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव भारत पर पड़ा, क्योंकि राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के अधिकांश पदक निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और टेबल टेनिस जैसे खेलों से आते रहे हैं। यदि ये सभी खेल शामिल होते, तो भारतीय दल में लगभग 90 से 100 अतिरिक्त खिलाड़ी शामिल हो सकते थे और पदकों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव थी।
विश्लेषकों का मानना है कि इन खेलों के बाहर होने से भारत संभावित रूप से 35 से 40 पदकों, जिनमें लगभग 15 से 18 स्वर्ण पदक शामिल हो सकते थे, से वंचित रह गया। यदि सभी पारंपरिक खेल आयोजित होते, तो भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या वर्तमान प्रदर्शन से कहीं अधिक होती और पदक तालिका में तीसरे या चौथे स्थान तक पहुंचने की प्रबल संभावना रहती। ऐसे में सीमित खेलों और सीमित अवसरों के बावजूद शीर्ष देशों में बने रहना भारतीय खिलाड़ियों की बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
इन परिस्थितियों में सबसे उल्लेखनीय बात भारतीय खिलाड़ियों का सफलता प्रतिशत है। वर्ष 2010 में नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 495 खिलाड़ियों के साथ 101 पदक जीते थे, जबकि 2022 बर्मिंघम में 210 खिलाड़ियों ने 61 पदक हासिल किए। इस बार केवल 122 खिलाड़ियों का दल भेजा गया, फिर भी भारत का प्रदर्शन अत्यंत प्रभावशाली रहा। यह दर्शाता है कि भारतीय खेल व्यवस्था अब केवल बड़ी टीम भेजने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता और बेहतर तैयारी पर भी ध्यान दे रही है।
ग्लासगो में भारतीय खिलाड़ियों ने यह भी साबित किया कि वे अब केवल पारंपरिक खेलों पर निर्भर नहीं हैं। जूडो में भारत को पहली बार स्वर्ण पदक मिले, जहां अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। वहीं पैरा एथलेटिक्स में दिलीप महादु गावित ने नया गेम्स रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता और स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार स्वर्ण जीतकर अपनी श्रेष्ठता को फिर साबित किया। इन उपलब्धियों ने यह संकेत दिया कि भारतीय खेल प्रतिभा अब नए क्षेत्रों में भी तेजी से उभर रही है।
नई दिल्ली 2010 के बाद भारत ने दोबारा राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी के लिए जल्दबाजी नहीं दिखाई। इसके बजाय सरकार ने 'खेलो इंडिया' और 'टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम' जैसी योजनाओं के माध्यम से खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, खेल विज्ञान और बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाया। इसका उद्देश्य केवल किसी एक आयोजन की मेजबानी करना नहीं, बल्कि भारतीय खेलों को दीर्घकालिक रूप से मजबूत बनाना और भविष्य के बड़े आयोजनों, विशेषकर 2036 ओलंपिक की तैयारियों को गति देना है।
ग्लासगो से हटाए गए खेलों के भविष्य को लेकर भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। यदि आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती, निशानेबाजी, क्रिकेट और तीरंदाजी जैसे खेल दोबारा शामिल होते हैं, तो भारत को निश्चित रूप से बड़ा लाभ मिलेगा। साथ ही भारत कबड्डी जैसे अपने पारंपरिक खेल को भी वैश्विक मंच पर स्थान दिलाने का प्रयास कर सकता है। देश में विकसित हो रही आधुनिक खेल सुविधाएं और बढ़ता खेल निवेश इस दिशा में मजबूत आधार प्रदान कर रहे हैं।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आर्थिक संकट किसी आयोजन का आकार छोटा कर सकता है, लेकिन खिलाड़ियों के हौसले को नहीं। सीमित संसाधनों, कम अवसरों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने जिस दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय दिया, उसने यह साबित कर दिया कि भारत की खेल संस्कृति अब पहले से कहीं अधिक मजबूत और परिपक्व हो चुकी है। यही विश्वास भविष्य में राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर ओलंपिक तक भारत की सफलता की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।
नोट: संपादकीय पेज पर प्रकाशित किसी भी लेख से संपादक का सहमत होना आवश्यक नही है ये लेखक के अपने विचार है।
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