अंग्रेजों के जमाने का मेरठ- 5
- कभी सांसला कंबल निर्माण के लिए पूरे देश में विख्यात था मेरठ.
- 1830 में एक सांसला कंबल की कीमत में आ सकता था 25 ग्राम सोना.

मेरठ अंग्रेजों के जमाने में कई उद्योग-धंधों के लिए मशहूर था। उस दौर में कई ऐसी चीजों का उत्पादन और निर्माण होता था जो अब अतीत के किस्सों में सिमट कर रह गई हैं। एक ऐसी ही चीज का नाम था सांसला कंबल। वैसे तो उन्नीसवीं शताब्दी में मेरठ में सामान्य कंबलों का भी निर्माण होता था, लेकिन सबसे ज्यादा मशहूरी सांसला कंबल को लेकर थी। यह न सिर्फ अत्यधिक महंगा था, बल्कि इसके खरीदार भी अभिजात्य वर्ग के लोग, अंग्रेज अफसर हुआ करते थे।
सांसला कंबलों का निर्माण अच्छी प्रजाति की भेड़ों के मेमनों से मिले ऊन से किया जाता था। मेमनों के पैदा होने के सिर्फ तीन दिन बाद उनका ऊन निकाला जाता था। यह बेहद नर्म और गर्म हुआ करता था। 1832 ईस्वी के आसपास 6 से 8 गज चौड़े सांसला कंबल का दाम 25 रुपया हुआ करता था। आप इसकी महंगाई का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 1830 में एक पौंड उस समय के 10 भारतीय रुपये के बराबर था। तीन पौंड में एक औंस अर्थात 31 ग्राम सोना मिलता था। यानि एक सांसला कंबल की कीमत में आपको उस दौर में 25 ग्राम सोना मिल सकता था। आज के दौर में 25 ग्राम सोने की कीमत 4 लाख 50 हजार रुपये से ज्यादा है।
ब्रिटिश राज में कपास और नील की खेती भी होती थी मेरठ और आसपास
सूती और रेशमी कपड़े भी बनते थे मेरठ में
आज मेरठ और आसपास का इलाका गन्ना, धान और गेहूं की खेती के लिए जाना जाता है। कभी इस क्षेत्र में कपास की खेती खूब होती थी। 1830 से लेकर 19वीं सदी के आखिर तक यहां कपास और नील की खेती बड़े पैमाने पर होती रही। इसीलिए इस इलाके में छोटे और मझौले आकार की कई कपड़ा मिलें स्थापित की गई थीं। इनमें मोटा सूती कपड़ा गाढ़ा से लेकर महीन कपड़ा बनता था। कुछ समय के लिए यहां पर शहतूत की खेती के साथ रेशम के कीड़े पालने का प्रयोग भी किया गया था, परंतु वह ज्यादा सफल नहीं हो पाया। मेरठ में रेशम की साड़ियां भी बनाई जाती थीं। हालांकि उसके लिए रेशम बनारस और कलकत्ता से मंगाया जाता था।
500 मन नील बनाने की फैक्ट्री गाजियाबाद में लगाई थी एक अंग्रेज ने
हम सभी जानते हैं कि बिहार में नील की खेती करने वाले किसानों की दुर्दशा देखकर 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ पहला मोर्चा खोला था। इससे लगभग सौ साल पहले तक अंग्रेजों ने मेरठ और आसपास के इलाके में नील की खेती पर जोर दिया था। स्थानीय किसानों पर दबाव डालकर वे नील की खेती करवाते थे। नील एक पौधे से निकलता था। जिसका उपयोग औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड के मानचेस्टर में स्थापित की गई कपड़ा मिलों में रंगाई के लिए किया जाता था। भारतीय जलवायु नील के पौधों के लिए उपयुक्त थी। लिहाजा बंगाल, बिहार से लेकर अंग्रेजों ने पूरे उत्तर भारत में नील की खेती करवाना शुरू किया। ज्यादातर किसानों से जबरन नील बोने को मजबूर किया जाता था। गाजियाबाद तहसील के डासना नामक स्थान पर 1860 के आसपास भारत का सबसे बड़ा नील का कारखाना स्थापित किया गया था। इसे माइकेल के कारखाने के नाम से जाना जाता था। इसका स्वामी एक यूरोपियन था। इस कारखाने में 500 मन नील का उत्पादन किया जाता था। उस दौर में एक मन नील का दाम 135 रुपये के आसपास था। बाद में नील के दाम बड़ी तेजी से बढ़े थे। 500 मन नील का दाम एक लाख रुपये से ज्यादा जा पहुंचा था।
- ( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं )
अगले अंक में अंग्रेजों के जमाने की किसी और चीज की चर्चा
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