Kanwar Yatra 2026: जेन-जी की क्रिएटिविटी ने कांवड़ में भरे आस्था संग इतिहास और समाज के रंग, 25 लाख तक की झांकियों में दिखा विज्ञान, पर्यावरण और शहीदों का सम्मान
मेरठ से गुजर रही कांवड़ यात्रा के अंतिम चरण में नई पीढ़ी (Gen-Z) की अनोखी क्रिएटिविटी और तकनीक का संगम देखने को मिल रहा है। युवाओं ने लाखों रुपये खर्च कर विशाल कांवड़ों के माध्यम से न केवल भगवान शिव के पौराणिक रूपों को दर्शाया है, बल्कि केदारनाथ मंदिर, अग्नि-5 मिसाइल, गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों और पर्यावरण संरक्षण के जीवंत संदेश भी प्रस्तुत किए हैं।
मेरठ: कांवड़ यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। हरिद्वार से गंगाजल लेकर मेरठ के रास्ते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे शिवभक्तों के कदमों के साथ सड़कों पर आस्था के अनगिनत और मनमोहक रंग दिखाई दे रहे हैं। इनमें सबसे खास आकर्षण जेन-जी (Gen-Z) यानी नई पीढ़ी की क्रिएटिविटी बन चुकी है।
युवाओं ने अपनी आधुनिक सोच, कला और तकनीक के माध्यम से विशाल कांवड़ों को केवल धार्मिक प्रतीक न बनाकर सनातन संस्कृति, भारतीय इतिहास और सामाजिक संदेशों का एक चलता-फिरता मंच बना दिया है। इन भव्य और आकर्षक कांवड़ों के निर्माण में युवाओं की टोलियों ने ₹25 लाख तक की धनराशि खर्च की है।
पौराणिक मान्यताओं संग दिखा 'अग्नि-5' और 'केदारनाथ' का रूप
कांवड़ पथ से गुजरती विशाल झांकियां राहगीरों को ठहरने पर मजबूर कर रही हैं:
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रौद्र और नटराज स्वरूप: भगवान शिव के रौद्र रूप, नटराज स्वरूप, तांडव नृत्य और देवी पार्वती के मां काली रूप के साथ-साथ भगवान हनुमान की विभिन्न जीवंत झांकियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
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विज्ञान और आस्था का संगम: कांवड़ पथ पर जहां एक ओर केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति ने आस्था के रंग बिखेरे, वहीं अग्नि-5 (Agni-5) मिसाइल की प्रतिकृति और 'भारत माता' की कांवड़ ने देशभक्ति और भारत की वैज्ञानिक प्रगति को प्रदर्शित किया। लकड़ी (Wooden), चारकोल और आधुनिक लाइट-साउंड सिस्टम से बनी ये कांवड़ें बेहद जीवंत लग रही हैं।
इतिहास के गुमनाम शहीदों और महापुरुषों को मिला स्थान
जेन-जी की कांवड़ों की खासियत केवल धार्मिक स्वरूप तक सीमित नहीं रही। युवाओं ने भारतीय इतिहास के उन पन्नों को भी उकेरा जिन्हें अक्सर भुला दिया जाता है:
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मातादीन वाल्मीकि को समर्पित झांकी: दिल्ली के करोलबाग से आई एक कांवड़ झांकी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के जननायक मातादीन वाल्मीकि की शहादत को समर्पित रही।
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वीर गाथाएं: दिल्ली के तिगरी निवासी 25 सदस्यीय 'वाल्मीकि युवा शक्ति ग्रुप' ने भगवान शिव के साथ दादा सबल सिंह और दादा केसर सिंह की जीवन गाथा को खूबसूरती से अपनी कांवड़ में प्रदर्शित किया।
1,100 पौधे बांटकर जगाई पर्यावरण की अलख
धर्म और इतिहास के साथ-साथ युवाओं ने सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दिया:
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दिल्ली निवासी सोनू ने अपनी 225 किलोमीटर की पदयात्रा पर्यावरण को समर्पित की।
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वे हरिद्वार से गंगाजल के साथ 1,100 पौधे लेकर चले और पूरे रास्ते श्रद्धालुओं व स्थानीय लोगों को भोलेनाथ के प्रसाद के रूप में पौधों का वितरण किया। पर्यावरण का संदेश देने के लिए उन्होंने अपने वाहन और पोशाक को 'ग्रीन ग्रास' (Green Grass) थीम में ढाला था।
सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी नई पीढ़ी
लाखों रुपये खर्च कर तकनीक, लाइट-साउंड, फाइबर और क्राफ्ट वर्क से तैयार की गई ये विशाल कांवड़ें इस बात का प्रमाण हैं कि आज की नई पीढ़ी तकनीक और आधुनिक जीवनशैली के बीच भी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई है।
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