कालीन नगरी भदोही जिले के सारीपुर गांव की पूर्वांचल में है अलग धाक
Sanjay Knockout | पहले वाराणसी और अब भदोही जिले में स्थित सारीपुर गांव की एक अलग पहचान रही है। गोपीगंज से यह गांव पांच से छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। व्यवसाय की दृष्टि से कालीन का ही काम होता है।इस गांव का राजनीति से अहम नाता रहा है। जिले में ही नहीं पूर्वांचल में इस गांव की एक अलग पहचान है।अस्सी के दशक में ब्लाक प्रमुख रहे ज्वाला सिंह का जिले में काफी बोलबाला रहा।उनकी सफलता उनके धुर विरोधियों को रास नहीं आती थी।
इस वजह से उनके दुश्मन भी कम नहीं थे।पेशे से वकील ज्वाला सिंह को निशाना बनाते हुए हमलावरों ने वर्ष 1978, में ज्ञानपुर कचहरी परिसर से बमों और गोलियों से हमला कर दिया था।इस हमले में ज्वाला सिंह सुरक्षित बच गए। हालांकि, यह जीवनदान लंबा सफर तय नहीं कर सका। वर्ष 1983, नवंबर में दिवाली के दिन उनके आवास पर ही हमलावरों ने उनको गोलियों से भून डाला।
फिर परिवार और राजनीति की जिम्मेदारी उनके भाई दिनेश कुमार सिंह के कंधों पर आ गई। वर्ष 1988-89 में भारी मतों से जीत कर दिनेश कुमार सिंह ब्लाक प्रमुख बने। उनकी स्वच्छ छवि और मिलनसार स्वभाव के कारण उनकी भी पूर्वांचल की राजनीति में एक अलग धाक है। दिनेश सिंह ने विधानसभा चुनाव में कई बार किस्मत आजमाई पर सफलता नहीं मिली। इसकी मुख्य वजह यह रही उनके धुर विरोधी माफिया विजय मिश्रा धनबल के आतंक पर राजनीति में हावी रहा। इसके बावजूद भी दिनेश सिंह की लोकप्रियता में कमी नहीं आई।
ज्वाला सिंह की पत्नी सुशीला देवी काफी मृदुभाषी थीं। उनके बेटे राजेश सिंह अन्नू राजनीति में आना चाहते थे।यह बात उनकी मां को पसंद नहीं आई। अपने पति को खो चुकने के कारण बेटे को राजनीति में नहीं लाना चाहती थीं।बेटे के भविष्य को लेकर वाराणसी में एक ज्योतिष से मिलीं। ज्योतिष ने भी बेटे को राजनीति से दूर रखने की सलाह दी थी। इस बीच राजेश सिंह की माता सुशीला देवी का निधन हो गया। चार अप्रैल 2026,को राजेश सिंह अन्नू की मौत हो गई। अब परिवार में राजेश की पत्नी मंशा सिंह और उनकी बेटी शैब्या वाराणसी में रहकर जीवन-यापन कर रहीं हैं। अगली कड़ी में किसी और गांव की दास्तान का जिक्र करेंगे।
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