FCRA Amendment Bill 2026: विदेशी फंडिंग विवाद पर हरीश साल्वे की दोटूक— 'कोई दान मुफ्त नहीं आता'; संसद में चर्चा के बीच FCRA संशोधन विधेयक पर गहराया मंथन
लोकसभा में पेश किए गए 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026' (FCRA Amendment Bill 2026) पर देश भर में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने विदेशी फंडिंग पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि भारत के आंतरिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को रोकने के लिए विदेशी पैसे का इस्तेमाल चिंता का विषय है। 25 मार्च 2026 को संसद में पेश यह बिल निरस्त या रद्द हुए एनजीओ (NGOs) की संपत्तियों के प्रबंधन के लिए 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' (Designated Authority) बनाने और पारदर्शिता बढ़ाने का प्रावधान करता है।
नई दिल्ली: गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को मिलने वाले विदेशी फंड (Foreign Contribution) के नियमन और पारदर्शिता को लेकर लाया गया विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) संसद के मानसून सत्र में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए गए इस विधेयक को लेकर उठ रहे सवालों के बीच देश के वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे (Harish Salve) ने विदेशी दानदाताओं और एनजीओ फंडिंग की प्राथमिकताओं पर तीखे सवाल उठाए हैं।
वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने एक राष्ट्रीय टेलीविजन बहस में अपनी बात रखते हुए कहा कि विदेशी संस्थाओं द्वारा भारत में भारी-भरकम फंड भेजने की मंशा को समझना जरूरी है, क्योंकि दुनिया में कोई भी दान बिना किसी एजेंडे के नहीं आता।
हरीश साल्वे ने पश्चिमी दानदाताओं की प्राथमिकताओं पर उठाए सवाल
साल्वे ने पश्चिमी देशों के फंडिंग पैटर्न पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब दुनिया में गाजा या सूडान जैसे गंभीर मानवीय संकट चल रहे हैं, तो पश्चिमी दाता एजेंसियां भारत में पर्यावरण, मानवाधिकार या इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विरोध के नाम पर भारी रकम क्यों खर्च कर रही हैं?
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विकास परियोजनाओं में रुकावट: समर्थकों का तर्क है कि अतीत में नर्मदा के सरदार सरोवर बांध और कुडनकुलम परमाणु संयंत्र जैसी राष्ट्रीय महत्व की विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया गया था।
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पारदर्शिता की आवश्यकता: साल्वे और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जो संगठन समाज कल्याण के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें पारदर्शिता से डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास से समझौता नहीं किया जा सकता।
FCRA संशोधन विधेयक 2026 के मुख्य बिंदु (Key Provisions)
गृह मंत्रालय द्वारा पेश इस विधेयक का उद्देश्य FCRA 2010 के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक और प्रशासनिक दिक्कतों को दूर करना है:
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डेजिग्नेटेड अथॉरिटी (Designated Authority) का गठन: यदि किसी एनजीओ का लाइसेंस रद्द होता है, वह इसे सरेंडर करता है या उसका लाइसेंस रिन्यू नहीं होता (Cessation), तो विदेशी फंड से बनी उसकी संपत्तियों और बची हुई राशि का प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 'नामित प्राधिकारी' के पास चला जाएगा।
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2 साल में ₹10 लाख के खर्च का नियम: एफसीआरए लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए संगठनों को पिछले दो वित्तीय वर्षों में समाज कल्याण के कार्यों में कम से कम 10 लाख रुपये का विदेशी फंड इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा।
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सजा के प्रावधानों में राहत: कानून के उल्लंघन पर अधिकतम सजा की अवधि को 5 साल से घटाकर 1 साल का कारावास करने का प्रस्ताव है।
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धार्मिक स्थलों की सुरक्षा: किसी पूजा स्थल या धार्मिक संस्थान की संपत्ति का अधिग्रहण होने की स्थिति में उसके धार्मिक स्वरूप को बरकरार रखने का कानूनी संरक्षण दिया गया है।
विपक्ष की चिंताएं और सरकार का पक्ष
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समूहों (Civil Society) ने इस विधेयक का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि यह कानून सरकार को एनजीओ और धर्मार्थ ट्रस्टों पर मनमाना नियंत्रण हासिल करने का अधिकार देता है।
हालांकि, सरकार का कहना है कि यह विधेयक इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के शासनकाल से चले आ रहे एफसीआरए ढांचे का ही प्रशासनिक विस्तार है, जिसका एकमात्र उद्देश्य विदेशी प्रभाव और फंडिंग के माध्यम से होने वाली देशविरोधी गतिविधियों को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
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