Guru Dutt Birth Anniversary: गुरु दत्त की जयंती पर याद आई उनकी फिल्मों की काव्यात्मक खूबसूरती, जिसने भारतीय सिनेमा को दी एक नई परिभाषा
भारतीय सिनेमा के सबसे महान और दूरदर्शी फिल्मकारों में शुमार गुरु दत्त की जयंती पर पूरा देश उनकी काव्यात्मक और कालजयी फिल्मों को याद कर रहा है। 'प्यासा' और 'कागज के फूल' जैसी उत्कृष्ट कृतियों के जरिए उन्होंने सिनेमा को जो विजुअल पोएट्री दी, वह आज भी फिल्म निर्माण की दुनिया के लिए एक पवित्र किताब की तरह है।
मुंबई: भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी ऐसे फिल्मकार का नाम लिया जाता है जिसने पर्दे पर उदासी, निराशा और इंसानी जज्बातों को कविता की तरह पिरोया, तो जेहन में सबसे पहला नाम गुरु दत्त (Guru Dutt) का आता है। आज गुरु दत्त (मूल नाम: वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण) की जयंती है। इस खास मौके पर सिनेमा जगत और दुनिया भर के फिल्म प्रेमी एक ऐसे जीनियस को याद कर रहे हैं, जिनकी वर्सटैलिटी और फिल्मों की 'काव्यात्मक खूबसूरती' (Poetic Beauty) आज भी भारतीय सिनेमा का स्वर्ण काल मानी जाती है।
एक बेहतरीन अभिनेता, संवेदनशील निर्देशक और दूरदर्शी निर्माता के रूप में गुरु दत्त ने व्यावसायिक सिनेमा के बीच रहकर भी जिस कलात्मक ऊंचाइयों को छुआ, वह आज भी नए फिल्मकारों के लिए एक बड़ी मिसाल है।
पर्दे पर लिखी विजुअल पोएट्री (Visual Poetry)
गुरु दत्त का सिनेमा सिर्फ एक कहानी नहीं कहता था, बल्कि वह प्रकाश और छाया (Light and Shadow) के अद्भुत खेल से दर्शकों की आत्मा को छू लेता था। महान सिनेमैटोग्राफर वी.के. मूर्ति के साथ मिलकर उन्होंने जो विजुअल कंपोजिशन तैयार किए, वे आज भी दुनिया भर के फिल्म स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं।
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'प्यासा' (1957): समाज की बेरुखी और एक कवि के दर्द को बयां करती इस फिल्म को टाइम मैगजीन ने दुनिया की 100 सबसे बेहतरीन फिल्मों की सूची में जगह दी थी। 'जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला' जैसे गानों के जरिए उन्होंने जो दर्द पर्दे पर उतारा, वह अमर हो गया।
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'कागज के फूल' (1959): भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म, जो एक फिल्म निर्देशक के अकेलेपन और पतन की बेहद भावुक कहानी थी। इस फिल्म का 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' आज भी हिंदी सिनेमा का सबसे बेहतरीन काव्यात्मक गाना माना जाता है।
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साहिब बीबी और गुलाम व चौदहवीं का चांद: अभिनेता के रूप में इन फिल्मों में उनकी सादगी और गंभीर अभिनय ने दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया था।
अधूरा सफर, लेकिन अमर विरासत
39 साल की बेहद कम उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह देने वाले गुरु दत्त का जीवन भले ही छोटा और दुखों से घिरा रहा, लेकिन उनकी कला समय की सीमाओं से परे निकल गई। जब वे जिंदा थे, तब उनकी कई फिल्मों (जैसे कागज़ के फूल) को वह व्यावसायिक सफलता नहीं मिली जिसकी वे हकदार थीं, लेकिन आज उन्हें दुनिया भर में एक 'कल्ट' का दर्जा प्राप्त है।
उनकी फिल्मों का संगीत (एस.डी. बर्मन), गीत (साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी) और उनका खुद का निर्देशन मिलकर एक ऐसा ताना-बाना बुनते थे जो दिल को झकझोर देता था। आज उनकी जयंती पर, पूरा देश भारतीय सिनेमा के उस 'प्यासे' को नमन कर रहा है जिसने अपनी कला से सिनेमाई पर्दे को हमेशा-हमेशा के लिए सराबोर कर दिया।
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