योगी के अनुशासन वाले संदेश को चरितार्थ कर रही कांवड़ यात्रा, सामाजिक समरसता की बनी मिसाल
- पांच रथ, 75 शिवभक्त और 25 लाख की कांवड़ से बंधी सामाजिक समरसता की डोर.
- 26 वर्षों से निभा रहे परंपरा, अनुशासन और सेवा का संकल्प.
KNOCKOUT NEWZ MEERUT : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार कहते रहे हैं कि कांवड़ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। मेरठ के कांवड़ मार्ग पर शुक्रवार को इसका सजीव उदाहरण देखने को मिला। दिल्ली के सभापुर से आए शिव कांवड़ समिति के 75 सदस्य पांच भव्य रथों वाली कांवड़ के साथ न केवल भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था व्यक्त कर रहे हैं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, अनुशासन और सनातन परंपराओं के संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं।
दल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अलग-अलग जातियों और सामाजिक वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक परिवार की तरह यात्रा कर रहे हैं। सभी सदस्य एक ही नियम, एक ही अनुशासन और एक ही उद्देश्य के साथ 26वीं बार गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने निकले हैं।

अनुशासन ऐसा, जैसा गुरुकुल की परंपरा
दिल्ली के सभापुर निवासी चौधरी सुरेश भगत के नेतृत्व में यात्रा कर रहे इस दल में अनुशासन सर्वोपरि है। सभी सदस्य उनके निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। विश्राम, भोजन, दैनिक दिनचर्या और यात्रा का प्रत्येक चरण तय नियमों के अनुसार होता है। बिना अनुमति कोई सदस्य बाहरी लोगों से बातचीत तक नहीं करता। कांवड़ से जुड़ी जानकारी देने के लिए केवल अधिकृत सदस्य ही सामने आते हैं। दल के सदस्य बताते हैं कि यात्रा के दौरान हर दिन 30 से 35 किलोमीटर की पदयात्रा की जाती है। स्वास्थ्य, समय और व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि पूरी यात्रा मर्यादा और अनुशासन के साथ संपन्न हो।
सामाजिक समरसता का संदेश
इस कांवड़ दल में विभिन्न जातियों के 75 सदस्य शामिल हैं, लेकिन यात्रा के दौरान किसी प्रकार का ऊंच-नीच या भेदभाव दिखाई नहीं देता। सभी शिवभक्त एक साथ भोजन बनाते हैं, साथ चलते हैं और समान रूप से सेवा करते हैं। दल के सदस्य सोनू चौधरी बताते हैं कि वर्ष 2000 से लगातार कांवड़ ला रहे हैं और उनका समूह आत्मनिर्भर व्यवस्था के साथ यात्रा करता है। भोजन के लिए अलग हलवाई दल साथ चलता है और शिविरों में भोजन करना उनके नियमों के विरुद्ध है। यात्रा के दौरान बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के उत्साह का संतुलित संगम भी देखने को मिलता है, जो नई पीढ़ी को परंपरा और संस्कारों से जोड़ने का कार्य कर रहा है।

पांच रथों में सजी सनातन संस्कृति की झलक
करीब 25 लाख रुपये की लागत से तैयार पांच रथ इस यात्रा का प्रमुख आकर्षण हैं। इन्हें तैयार करने में लगभग 45 दिन लगे। सबसे आगे शिव परिवार की झांकी है, जबकि अन्य रथों में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं, योगमुद्रा में भगवान शिव, मां दुर्गा का शक्ति स्वरूप और पवनपुत्र हनुमान की भव्य झांकियां सजाई गई हैं। रास्ते भर श्रद्धालु इन झांकियों के दर्शन कर धर्म और संस्कृति के प्रति अपनी आस्था प्रकट कर रहे हैं।
आस्था के साथ समाज को जोड़ने वाली यात्रा
कांवड़ यात्रा का यह स्वरूप बताता है कि यह केवल गंगाजल लाने की धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम भी है। जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर, अनुशासन को सर्वोच्च मानते हुए और परंपराओं का सम्मान करते हुए यह दल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस संदेश को भी साकार करता दिख रहा है, जिसमें कांवड़ यात्रा को अनुशासन, सेवा, सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बताया गया है।
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